क्यूं कोसते हो उन लम्हों को,
वो जिंदगी भी तो आप ही ने जी थी..
क्यूं कहते हो कि मैं मजबूर हूं,
वो मजबूरी भी तो अपने सिर आप ही ने ली थी।
क्यूं समझते हो उन लम्हों को बैखौफ,
उन लम्हों की शुरुआत भी आप ही ने की थी।
क्यूं नहीं समझते इस बात को कि,
अब भी कोई बात न बिगड़ी है..
बिगड़े जब कोई बात तो देना मेरा साथ,
ये ख्वाहिश भी आप ही की थी।
क्यूं चल दिए तुम तन्हाईयों का बोझ
मुझे देकर,
कभी न होंगे तन्हा अकेले,ये कसम आपकी ही थी।
क्यूं इस सावन की बारिश में भी,
दर्द भरी अंगड़ाईयां ले रहा हूं अकेले..
सावन में नाचेंगें हम साथ मिलकर
ये बात भी आप ही ने की थी।
क्यूँ रोता आपकी याद में छुप-छुपकर,
जुदाई में आपकी विवश होकर..
गिराओ मेरी आंख का आंसू अपनी आंख से,
ये कसम भी आप ही ने ली थी।
क्यूं लिख रहा मैं अपने दर्द की गाथा,
‘आखिर क्यूं’ एक प्रेम कथा..
लिखेंगे हम अपनी मोहब्बत का इतिहास,
कुछ ऐसी शिद्दत आपकी थी।
क्यूं कोसते हो उन लम्हों को,
वो जिंदगी भी तो आप ही ने जी थी॥
#कृष्णा एम.दांगी
परिचय : कृष्णा एम.दांगी की जन्मतिथि १ दिसम्बर १९९९ है। आपका स्थाई निवास ग्राम सोनकच्छ (तह. नरसिंहगढ़)जिला राजगढ़ है। वर्तमान में मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में खातीवाला टैंक में रह रहे हैं। काव्य के शौकीन कृष्णा एम.दांगी फिलहाल सरकारी महाविद्यालय में बी.एस-सी. में अध्ययनरत हैं।