भारत@2047: आज़ादी की विरासत और हमारी ज़िम्मेदारी


भावना शर्मा, दिल्ली
लेखिका
सह संपादक, मातृभाषा डॉट कॉम

लाल किला इस बात की हर वर्ष गवाही देता है कि इसी भूमि से देश ने सदियों की गुलामी के बादलों को छंटते देखा है, हर 15 अगस्त को जब लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा लहराता है, तो हम एक तारीख़ का उत्सव नहीं मनाते बल्कि हम उस संकल्प को याद करते हैं, जिसके लिए एक पूरी पीढ़ी ने अपना वर्तमान भारत के भविष्य के नाम कर दिया था। 1947 में मिली आज़ादी केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं थी, वह अपने भविष्य का निर्माण स्वयं करने का अधिकार था।

भारत की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि यहाँ ‘भारत’ किसी एक भाषा, एक भोजन या एक संस्कृति का नाम नहीं। कश्मीर की बर्फ़ से लेकर केरल की बारिश तक, राजस्थान के लोकगीतों से लेकर असम के बिहू तक, तमिल की प्राचीनता से लेकर मैथिली की मिठास तक, नागालैंड के पर्वों से लेकर महाराष्ट्र की लोकपरंपराओं तक भारत अनेक संस्कृतियों का ऐसा जीवंत संवाद है, जिसमें विविधता कोई बाधा नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय पहचान की बुनियाद है।

हमारी आज़ादी का इतिहास भी इसी विविधता से बना है। महात्मा गांधी के सत्याग्रह से लेकर रानी लक्ष्मी बाई और सरदार भगत सिंह के विद्रोही साहस तक, सुभाषचंद्र बोस की अदम्य राष्ट्रवादी चेतना से लेकर सरदार पटेल के एकीकरण के प्रयास तक स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक विचार या व्यक्ति की कहानी नहीं था। यह उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात भारतीयों का सामूहिक स्वप्न था, जिन्होंने अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों से उठकर एक साझा भविष्य की कल्पना की।

स्वतंत्र भारत की यात्रा में प्रधानमंत्री पद भी इस बदलते भारत का आईना रहा है। जवाहरलाल नेहरू ने विभाजन का दंश झेल रहे हमारे देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की नींव मज़बूत की। लाल बहादुर शास्त्री ने सादगी और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया, साथ ही हरित क्रांति जैसे निर्णायक दौर देखे। इंदिरा गांधी के शासन काल के दौरान हमने केंद्रीकरण के साथ-साथ बांग्लादेश मुक्ति संग्राम देखा और मोरारजी देसाई ने लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन की संभावना को स्थापित किया, जबकि चरण सिंह ने ग्रामीण भारत और किसानों की आवाज़ को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रखा।

राजीव गांधी ने भारत को तकनीक और दूरसंचार के नए युग की ओर धकेला। जबकि वी.पी. सिंह का दौर सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए निर्णायक रहा और चंद्रशेखर जी ने कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में सरकार चलाई। पी.वी. नरसिम्हा राव ने आर्थिक उदारीकरण के रास्ते खोले। एच.डी. देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के छोटे कार्यकाल गठबंधन राजनीति की जटिलताओं के प्रतीक बने। अटल बिहारी वाजपेयी ने गठबंधन सरकार को स्थिरता और संवाद की भाषा दी। मनमोहन सिंह ने आर्थिक विशेषज्ञता और अपेक्षाकृत शांत प्रशासनिक शैली के साथ भारत की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भूमिका को विस्तार दिया। लगातार तीन बार से देश की बागडोर संभाल रहे हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने डिजिटल शासन, बुनियादी ढाँचे, वैश्विक कूटनीति और बड़े पैमाने पर जनकल्याण कार्यक्रमों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखा। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक अभिलेख इन सभी प्रधानमंत्रियों को स्वतंत्र भारत की राजनीतिक यात्रा के अलग-अलग पड़ावों के रूप में दर्ज करते हैं।

संविधान हमें समानता, स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकार और संवैधानिक उपचार जैसे मौलिक अधिकार देता है। लेकिन वही लोकतंत्र हमसे संविधान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रीय संस्थाओं के सम्मान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने, पर्यावरण की रक्षा करने, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करने और देश की एकता-अखंडता को मज़बूत करने जैसी ज़िम्मेदारियों की भी अपेक्षा करता है। स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद एक सवाल हमारे सामने अब भी खड़ा है, क्या आज़ादी का अर्थ हमारे लिए केवल अधिकारों तक सीमित रह गया है? या हमने उसके साथ जुड़े कर्त्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से समझा है?

आज़ादी का अगला पड़ाव शायद चंद्रमा, सूर्य या किसी ग्रह पर पहुँचना भर नहीं है। वह दिन होगा जब किसी बच्चे की भाषा उसके अवसर तय न करे, किसी लड़की की सुरक्षा उसका सपना सीमित न करे, किसी नागरिक की ग़रीबी उसकी गरिमा न छीने और किसी की धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान उसके भारतीय होने पर सवाल न खड़ा करे। विकसित-2047 की ओर बढ़ता भारत केवल दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना न देखे, वह ऐसा समाज बनने का भी सपना देखे जहाँ विकास का अर्थ आख़िरी व्यक्ति तक अवसर पहुँना हो।

हमारा तिरंगा केवल आसमान में लहराने वाला कपड़ा नहीं है। उसके तीन रंग हमें याद दिलाते हैं कि स्वतंत्रता केवल विरासत नहीं, एक सतत् ज़िम्मेदारी भी है। भारत को आज़ादी 1947 में मिली थी लेकिन एक अधिक न्यायपूर्ण, समान और मानवीय भारत की आज़ादी हमें हर पीढ़ी में फिर से हासिल करनी होगी। यही शायद स्वतंत्रता दिवस का सबसे सच्चा अर्थ है।

matruadmin

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।