कविता- रोशनी की लकीर तलाश रही हूँ

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स्त्री देह को रौंदने वाली
पाशविक मनोवृत्ति
किसी युग में नहीं बदलेगी।
कितने ही आन्दोलन हो जाएँ,
कुर्बानियाँ दी जाएँ,
स्त्री को उपभोग की वस्तु समझना
बंद नहीं हो सकता कभी।

प्रदर्शन की वस्तु,
ख़रीदी-बेची जाने वाली
चलती-फिरती गुलाम से अधिक
नहीं है स्त्री देह का सच।

बदला लेना है तो
बहन-बेटियों से बलात्कार करो,
यही है इस सदी का दर्शन।
यही बचा रह गया है पुरुषत्व का अर्थ?
कुँआरी हो या विवाहित
अब स्त्री न किसी की पत्नी है,
न चाची, न मौसी, दादी या नानी माँ।
नहीं है वह मंदिर में पूजी जाने वाली
देवी या जगत जननी।
वह तो अब सिर्फ़
आटे की तरह गूंदे जाने वाली
मांस की पोटली है।
या फिर माटी की तरह
रौंदी जाने वाली धूल ।
कहाँ रही उसकी देह पावन गंगा!

कुत्सित मन का चरम सुख है औरत।
पौरुषहीन मन को राहत देने वाली सिगरेट
या कि बीड़ी के सिरे पर सुलगता नशा!

उसे पेट्रोल डाल कर जला दो।
गाजर, मूली सा काट कर फ्रिज में भर लो।
यहीं तक सिमट कर रह गया है उसका वजूद।
इंसानियत को कफ़न-सा ओढ़ने वालो
तुम्हारे नाकारा उन्माद के
गिलगिले जुनून का नाम है औरत।

देह को चिथड़े-चिथड़े कर
हवा में उड़ाने वालो
कुत्सा का नंगा नाच नाचने वालो
मत भूलो कि नहीं हो तुम सर्वशक्तिमान।
याकि तुम्हारी बजबजाती कायरता
नहीं है परम सत्य।

सृष्टि की हलचल और
पृथ्वी का नमक है औरत।
पुरुषत्व के छिन जाने की जलन
और नपुंसकता के प्रतिशोध में
अंधी कायरता का सर्वनाश है औरत।

साधना गृहों के षड्यंत्रों में
मंदिरों के गूंजते, शंख, मंजीरों की
स्वर लहरियाँ, हो चलीं हैं कर्कश
दीप की पावन ज्योत को
दुर्गंघ भरे अंधकार ने ढक लिया है।
चरस और गाँजे के धुएँ में
विलीन हो चुकी है अगरु और
चंदन की वह दिव्य सुगंध
जो कभी आत्मा को
भर देती थी दिव्यानंद से।

अब कैसे प्रकट हो दुर्गा और काली ?
कौन सुनेगा पुकार?
थक चुकी हैं दिशाएँ।
वे खो गई हैं अंधेरी गहरी गुफ़ाओं में।
दिशाओं को भेद कर
उजाले का विस्फोट करता
प्रकटेगा अरुणाभा से दीप्त
एक और नया सूर्य
समुद्र के गर्भ से।

डॉ. पद्मा सिंह

साहित्य मन्त्री, श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इन्दौर

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