
एकदूजे को दर्द से उबारना चाहिए
भुलाकर भेद सारे संवारना चाहिए
सोच रहा हूं गम क्यों इज़ाद हो रहा
क्यों न इसे मिलकर मारना चाहिए
कर रहे आवाम के दुश्मन मनमानी
अब तो हमे इन्हें ललकारना चाहिए
बोझिल हो गई साँसे दम भी घुट रहा
लगा पौधे धरा का कर्ज उतारना चाहिए
आज के बच्चे बेशक कल का भविष्य हैं
क्यों न उनकी प्रतिभा निखारना चाहिए
#किशोर छिपेश्वर”सागर”
भटेरा चौकी बालाघाट

