याद बहुत आते हैं

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वो मक्के की रोटी,
और चने का साग।
याद बहुत आते हैं हमको,
वो नानी के घर की शाम।

गाँव की वो नहर जिसमें,
मस्ती किया करते थे।
आम की वो डाली जिस पर,
झूला झूला करते थे।
याद मुझको बड़े आते हैं,
वो उल्टे सीधे काम।
याद बहुत आते हैं हमको,
वो नानी के घर की शाम।
वो मक्के की………

सिलबट्टे की चटनी और,
चूल्हे की मंदी आँच।
देशी घी की खुशबू और,
यारों का वो नाँच।
याद आज भी हैं मुझको,
वो कच्चे पक्के आम।
याद बहुत आते हैं हमको,
वो नानी के घर की शाम।
वो मक्के की………

नाना नानी की खाट जिसपे,
हम सोया करते थे।
खेतों की वो मिट्टी जिसमें,
यूँ ही बीज बोया करते थे।
आज भी भूल ना पाते हैं हम,
गिल्ली डन्डा का नाम।
याद बहुत आते हैं हमको,
वो नानी के घर की शाम।
वो मक्के की………

स्वरचित
सपना (सo अo)
प्राoविo-उजीतीपुर
विoखo-भाग्यनगर
जनपद-औरैया

matruadmin

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बुध्द

Wed May 26 , 2021
कोटि – कोटि नमन है, बुध्द तुमको सुख-शांति-सहनशीलता दो सबको । अहिंसा परमों धर्म बन जाएं सबका स्वच्छ-स्वस्थ बना दो सबके तन को ।। दूषित वातावरण को कर दो शुध्द दूषित विचारों का बंद करों युध्द । शांत-प्रकृति और सफलता दो सबको कण- कण में बस जाएं भगवान बुध्द ।। […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।