हे मेरे राम काव्यसंकलन प्रत्येक रामभक्त को अवश्य पढ़ना चाहिए

0 0
Read Time7 Minute, 54 Second

संसार के प्रथम सर्वमंगलरूप पर केन्द्रित हे मेरे राम कुल 155 पृष्ठ ई बुक के रूप में मेरे सामने है।पुस्तक का मुख्य पृष्ठ आकर्षक बहुरंगी तो है ही राम लक्ष्मण सीता और विनतभाव हनुमान जी के चित्र से नयनाभिराम हो गया है।ज्ञानोदय साहित्यसंस्था कर्नाटक के अध्यक्ष डा.सुनील कुमार परीट लम्बे समय से दक्षिणभारत में हिन्दी भाषा व साहित्य के लिए समर्पित हैं।उन्होंने इसका संपादन किया है।भूमिका पं. बालकृष्ण पचौरी ने लिखकर इस कृति संपादक व संकलित रचनाकारों पर बहुत कुछ कह दिया है।उन्होंने राम नाम की महिमा उसको रटने का आहृवाहन किया है।राम का नाम यमदूतों को भगाने में समर्थ है।मां शारदे की कृपा स्वंयमेव मिल जाती है।इनके अनुसार संकलन की रचनाएं एक से बढ़कर एक हैं।संकलन भक्ति और शांति की लहर फैलने की ओर एक सार्थक पहल है।अध्यात्मिक साहित्यिक क्षेत्र में निश्चित रूप से अपनी छाप छोड़कर समाज का मार्गदर्शन करेगा।संपादकीय में संपादक ने भगवान श्रीरामचन्द्र जी हम सबके आदर्श हैं और ऐसा लगता है कि इस तरह का संकलन बनाकर हम सब रचनाकार साहित्य जगत के लिए आदर्श बन गए हैं स्वीकारा है।
प्रथम कविता के रूप में संकलन में साकार ब्रह्म कविता है जिसको महामण्डलेश्वर महंत श्री 1008 रामभूषण दास ने लिखकर मानव से महामानव की यात्रा को राम के माध्यम से समझाया है।कैसे जन जन के बने।वाल्मीकि तुलसी का जनना बनकर रामायण रामचरित की रचना इसमें है।संकलन की आरम्भिक समीक्षा रामकाव्य महासागर शीर्षक से सोदाहरण डा. वसुधा पु. कामत ने लिखी है उनके अनुसार संपादक ने कलयुग के हनुमान बन सभी को रामभक्ति सिखाने का काम किया है।रचनाकारों ने वाल्मीकि सा प्रयास कर रामगाथा की गंगा बहा दी है।बहुभाषाविद लेखिका ने नेमीचंद, डा. छतरसिंह, शैलेन्द्र, नंदसारस्वत, डा. इन्दिरा गुप्ता, निर्मला की रचनाधर्मिता का उल्लेख किया है।वह स्वंय इस रामनामी महासागर में गोता लगाते लगाते राममय हो गई हैं।रामकाज में लगकर अनेक रूपमय हो गईं।उनके अनुसार हर पाठक को यह रामकाव्य अवश्य पढ़ लेना चाहिए।कोराना महामारी के समय में इस संजीवनी बूटी की सभी को नितांत आवश्यकता भी है।
इसके बाद आरम्भ होता है रचनाओं का अनुक्रम हे रघंनन्दन, हे मेरे राम, राम मेरे, राम भक्ति राम नाम के दोहे आदि आदि श्रीराम जीवन का आधार तक एक सौ चौबीस रचनाएं काव्यसाहित्य की विविध विधाओं में प्रभु रामचन्द्र जी के अनेकशः स्वरूपों विशिष्टताओं और संसार के लिए उपादेयताओं को सामने रखती हैं।रचनाकारों की बात करें तो नये पुराने उत्तर दक्षिण से भारत के पन्द्रह राज्यों एक केन्द्रशासित प्रदेश चण्डीगढ़ से तो हैं ही एक रचनाकार पड़ोसी देश राम की ससुराल नेपाल के काठमाण्डू से भी हैं।नाम में क्या रखा है पर देखूं तो श्री सुरेश शर्मा, नेहा जग्गी, अ. कीर्तिवर्धन, संजय कुमार अम्बष्ट, शरदनारायण खरे, मुकेश कुमार ऋषि,डा. शैलजा टी. एच, अरूणा अग्रवाल,डा. वासुदेवन, संजय पाण्डे साधनामिश्रा, डा. जमुना कृष्णराज,दिनेश चन्द्र प्रसाद दीनेश, जयप्रकाश अग्रवाल,बी निर्मला कक्षा नवम् की छात्रा कु. सनमती कुलकर्णी व मैं स्वंय आदि की रचनाएं सम्मिलित हैं।इसके बाद संपादक का सचित्र परिचय उसके कृतित्व व्यक्तित्व का दर्पण है।
संकलित रचनाओं में मिथिलापुत्री सीता, कैकेयी की डाह, लक्ष्मण के कड़वे बोल, हनुमान का संबल, राजा बनते सुग्रीव विभीषण, पक्षिराजजटायु का बलिदान,शबरी की जूठन,खगमग का दलबल, अहल्या उद्धार, केवट की नाव, रामेश्वर पूजा, वालमीकि का मरामरा, गणिका, अजामिल गज, नरसिंह, मोदीयोगी राममन्दिर आर्यावृत्, दशरथ कौशल्या, शत्रुध्न भरत,गुरुवशिण्ठ,तुलसी की आराधना, जातिधर्म क्षेत्र की लंका, आतंक, राष्ट्रद्रोह, गुरुकुल, धनुषभंग, पतझड़ से सावन, विश्वामित्र का अस्त्रज्ञान, वैद्य सुषेण,पुष्पक विमान, दीवाली, कनकभवन ओरछाधाम, भोलेशंकर, कम्बोडिया प्रहृलाद,गांधी, वनवास, रघुवंशीरीत, भारतीय संस्कृति, झूठ अन्याय, अशोक वाटिका, अग्निपरीक्षा, एक पत्नीत्व, गिलहरी की श्रम समानता के दर्शन विविध परिप्रेक्ष्य में हैं।रोजमर्रा के जीवन जन्म से मरण तक रामनाम जैसे रचा बसा है।वह इस संकलन में दिखकर बड़ा संकेत दे रहा है कि डा0 सुनील कुमार परीट जी का हनुमान सा प्रयास सराहिए।विविध विधाओं में रचनाओं का आनन्द लीजिए।प्रभुश्री राम पर आस्था विश्वास रखने वाले सभी के लिए यह संकलन महत्वपूर्ण है।उनके जीवन का धन्य करने वाला है।अतः उनको या कहूं सबको अवश्य पढ़ना प्रसारित प्रचारित करना चाहिए।
जिस तरह से आज अयोध्या नये रंग रूप साज सज्जा ले रही है।वैसे ही आजकल के रामभक्तों के सृजनकणों से आलोकित हे मेरे राम काव्यसंकलन परमपावन रामनवमी पर लोकार्पित होकर साहित्यजगत के लिए महत्वपूर्ण योगदान बन ज्ञानोदय साहित्य संस्था कर्नाटक संपादक डा0 सुनील कुमार परीट सहयोगी डा0 वसुधा पु. कामत व डा0मलकप्पा अ. महेश को यश यशस्वी बनाने के साथ साथ जीवन में सार्थकता देगा।जनकदुलारे रामदूत श्री हनुमान किसी न किसी रूप में सर्वसिद्धि हेतु उपस्थिति होंगे।इस पुनीत कार्य से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप् से जुड़े सभी को बहुत बहुत बधाई व प्रभु रामकाज के लिए वन्दन अभिनन्दन।

शशांक मिश्र भारती
शाहजहांपुर (उत्तरप्रदेश)

matruadmin

Next Post

न समझ सका…

Sun Apr 25 , 2021
सब कुछ होते हुए भी यहाँ वहाँ खोजता रहा। जिसे तुझे खोजना था वो तेरे से दूर होता गया। और तू प्रभु का खेल कभी समझ न सका। बस दौलत के पीछे ही तू सदा भागता रहा।। इस दौलत के जाल को अच्छे अच्छे नहीं समझ सके। बस इसके मायावी […]

पसंदीदा साहित्य

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।