
खून का रंग लाल अच्छा नहीं लगता
हो रहा जो बवाल अच्छा नहीं लगता
आएंगे अब अच्छे दिन, बात पुरानी है
जहन में ये खयाल अच्छा नहीं लगता
बिक रहा जिधर देखो मौत का सामान
ढोल नगाड़े गुलाल अच्छा नहीं लगता
बिछाया है किसी ने गरीबों को फंसाने
हकीकत यही जाल अच्छा नहीं लगता
दर्द से तड़पकर कोई रो रहा देख लो
कितना बुरा ये हाल अच्छा नहीं लगता
-किशोर छिपेश्वर”सागर”
बालाघाट

