भाग नेता भाग

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इमरत और सुखिया ने गमछे के ऊपर रखी दो रोटियों को आधा आधा कर मही में गीला कर के खा लिया था और वे अपनी झोपड़ी में लेट गए थे । दोपहरी सिर पर चढ़ चुकी थी । इमरत तो रोज सुबह जल्दी ही घर से खेत पर आ जाता और काम करने लगते । गेूंूह की फसल पक कर तैयार हो चुकी थी पर उसे काटने के लिये मजदूर नहीं मिल रहे थे । इमरत ने यह जमीन बटाई पर ली हुई थी सो उसे काटने की जिम्मेदारी भी उसी की थी । इमरत रोज सुबह आकर गेहूं काटने लगता और घर का काम निपटाकर सुखिया भी आ जाती तो वह भी उसका हाथ बटाती । जब सूरज सिर तक आ जाता तब दोनों रोटी खाकर थोड़ा सा विश्राम करते । इमरत की तो आदत थी कि जरा सा लेटा नहीं कि उसके खुर्राटे की आवाज दूर क गूंजने लगती । आज भी वे लेटे ही थे कि इमरत की तो भयानक खुर्राटे की आवाज सुनाई देने लगी । इसी के चक्कर में नेताजी कब उसके झोपड़े के सामने आकर खड़े हो गए उन्हें पता ही नहीं चला । वो मुन्नू ने जोर की आवाज लगाई तो सुखिया उठकर बैठ गई । मुन्नू तो नेताजी का खास आदमी था । वह नेताजी का खास आदमी केवल चुनाव के समय तक ही खास रहता इसके बाद नेताजी गांव वालों की तरह उसे भी भूल जाते । गांव में नेताजी का आना केवल तब ही होता जब चुनाव आने वाले हों । पेताजी फालतू में गांव आकर अपनी इनर्जी बरबाद नहीं करते । उनकी यही बची हुई इनर्जी के कारण उनका शरीर दो वाई दो से चार बाई चार की परिधि को घेर चुका था । गांव वाले हर बार नेताजी को पहचान ही नहीं पाते क्योंकि वे नेताजी को जिस साइज में देखते अगलीबार उनकी वह साइज बदल चुकी होती । पर मुन्नू साल में एकाधबार उनसे उनके बंगले पर जाकर मिल आता था सो उसे नेताजी की साइज का ध्यान रहता और वह ही उन्हें सबसे पहिले पहचान लेता फिर बाकी गांवा वालों को याद दिलाता ‘‘अरे वही नेताजी…..जो पिछलीबार आये थे…….उन्होने कहा था न कि गांव में स्कूल बनवा देगें……..अपन ने उनको वोट दिया था…….वही नेताजी हैं’’ । स्कूल के नाम पर गांव वाले पहचान जाते क्योंकि गांव में अभी भी स्कूल नहीं बना था । इसके पिछलीबार गांव वाले नेताजी को सड़क के नाम से पहचान पाए थे वो भी अभी तक नहीं बनी है । नेताजी हर बार नया वायदा करते और गांव वाले नेताजी को उस वायदे के आधार पर पहचान लेते ।
मुन्नू को जोर से आवाज लगानी पड़ी क्योंकि इमरत के खुर्राटों की आवाज का शोर चारों आरे फैल रहा था । इमरत मेहनत करता है तो उसके खुर्राटे निकलते हैं । मेहनतकश व्यक्तियों को फटी दरी पर भी नींद इसी वजह से आ जाती है वरना नेताजी जैसे लोग तो मखमली बिछौने पर भी करवटे बदलते रहते हैं । मुन्नू की आवाज सुखिया ने सुनी उसने इमरत को उठाया । अलसाये इमरत ने अपनी आंखें खोलीं तब तक नेताजी मुन्नू के साथ उसकी झोपड़ी में प्रवेश कर ही चुके थे । नेताजी के पास समय कम होता है । वे इमरत के पूरा जाग जाने तक का समय खर्च नहीं कर सकते थे । उन्हें आगामी एक महिने में ऐसे जाने कितने जाने-अंजाने इमरतों से मिलना था । यदि वे हर इमरत के जाग जाने का इंतजार करते रहें तो उनका समय तो यूं ही बरबाद हो जायेगा । आमजनता से मिलने में चुनाव के मौसम के अलावा कभी अपना समय बरबाद नहीं करते । आमजनता भी नेताजी से मिलने में अपना समय बरबाद नहीं करती क्योंकि वह भी समझने लगी है कि नेताजी की चुनाव के समय की मुस्कान और बाकी के दिनों की मुस्कान में जमीन आसमान का अंतर होता है ।

        सुखिया ने अपने सिर पर आंचल ले लिया था । पर इमतर अपनी फटी धोती को केवल अपनी टांगों तक ही समेट पाया था । नेताजी ने रेडीमेड मुस्कान लेकर उससे ‘‘राम...राम’’ की । उसने केवल अपना सिर ही हिलाया । नेताजी सुखिया ने पैर छूने की नाटक किया

‘‘आप कैसे हैं……दद्दा जी….’’
नेताजी ने इमरत को देखते हुए पूछा । इमरत के चेहरे पर दद्दा जी सुनने से हुई पीड़ा के भाव उभर आए । मेहनत करने वाले भरी जवानी में ही दद्दा लगने लगते हैं और नेतागिरी करने वाले 80 साल में भी जवान ही दिखते हैं । इमरत जानता है कि उसकी उम्र नेातजी की उम्र से कम है तब भी नेताजी युवा प्रत्याशाी का बोर्ड टांगे घूम रहे हैं और वह उम्र कम होने के बाबजूद भी दद्दा की श्रेणी में आ गया है । पर वह चुप रहा ।
‘‘देखो दद्दा चुनाव आ रहे हैं…….आप तो जाने ही होगें…..और यह भी जानते होगें कि वोट किसे देना है….’’ नेताजी खी…खी कर हंसे ।
‘‘किसे….’’ । इमरत के चेहरे पर वाकई प्रश्नवाचक चिन्ह उभर आया था ।
‘‘मुझे और किसे……’’ । नेताजी ने इमरत की पीठ पर एक धौल जमाई और फिर खीं….खीं कर हंसे पड़े । उन्हें हंसता देख कर उनके खास चमचे मुन्नू ने भी हंसना अपना फर्ज समझा और नेताजी से ज्यादा जोर से खी…खीं…. निकाली । मुन्नू की खीं…..खीं…सुन मुन्नू के चमचों ने भी खी…खी…की । हालंाकि वे स्वंय जब हंसते हैं तो खंीं…खीं कर नहीं हंसते बल्कि ‘‘हो…..हो’’ करते हैं पर उनके नेता याने मुन्नू ने खीं…खीं की तो उन्हें भी हंसते समय खीं…खीं ही करनी पड़ी । मुन्नू ने भी अपने नेताजी की खीं……खीं… को सुनकर स्वंय भी खीं…खीं की थी वरना वह भी ऐसा हंसता है कि पेड़ की छाया में सोये पक्षी तक डर कर भाग जाते हैं । इमरत की झोपड़ी में थोड़ी देर पहिले तक उसके खुर्राटे गूंज रहे थे और अब नेताजी की खीं…खीं गूंज रही थी । मुन्नू का खीं…खीं करना नेताजी को पंसद नहीं आया । उन्होने खूंखार निगाहों से मुन्नू को देखा । मुन्नू डर गया । उसकी गली का कुत्ता भी जब उसे खूंखार निगाहों से देखता है तब भी वह ऐसे ही डर जाता है । उसे नेताजी के चेहरे पर अपनी गली के कुत्ते का चेहरा दिखाई देने लगा । वह डर गया उसे डरा हुआ देखकर उसके साथी भी डर गए । सभी डरे तो झोपड़ी में शांति छा गई । नेताजी को यह खामोशी अखरी । वे बाहर निकल आए । उनके साथ सभी बाहर निकल आए । इमरत और सुखिया भी बाहर निकल आए । नेताजी जा चुके थे ।
इमरत और बुधिया की दोपहरी बरबाद हो चुुकी थी । दोनों खेतों पर जाकर काम करने लगे ।
‘‘जा राशन वाले ने आज सुई गेहूं नहीं दओ…….कह रहो थे जा महिना ने मिल है’’
‘‘जै ठठरी बंधे बाजार में बेच के खा जात हैं…तू संुई काय जात है बेर बेर’’
इमरत ने नाराजी जाहिर की ।
‘‘और जेहें ने तो का खा ले हैं…..माटी की रोटी……’’
इमरत की पत्नी ने बुरा मंुह बनाकर कहा ।
‘‘जे अभे नेताजी आए थे तो उनसे काहे नहीं कही कि राशन वालों हर महिना राशन नई देय’’
‘‘वे का कर लेहें. वे तो केवल वो मांगवे ही आत हैं ’’सुखिया ने एक बार फिर बुरा मुंह बनाया ।
इमरत की पत्नी सुखिया गांव की दबंग महिला थी इमरत सीधा साधा व्यक्ति था । वह फालतू के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता था पर सुखिया अपने हक की आवाज पर लड़-झगड़ पड़ती थी । वैसे इमरत जानता था कि उसकी पत्नी के ही कारण उसे दो टाइम की रोटी मिल पा रहीं है वरना तो वे जिसका खेत बटाई पर रखें हैं न, वो ही उसे मजूरी न दे ।
नेताजी ने सभी को माता के चैंतरा पर बुलवाया था । गांव में माता का चैंतरा सबसे प्रमुख स्थल होता है । इस चैंतरा पर बैठकर गांव के बुजुर्ग अपने घर से रिटायर्ड होकर अपना दिन काटते हैं । कुछ लोग ताश भी खेलते हैं और कुछ चैंपड़ । बच्चे लुकाछिपी से लेकर छीलछलाई तक का खेल भी यहीं खेलते हैं । गांव का यह चैतरा कोप भवन का काम भी करता है । घर की महिलायें अपने घर में लड़ाई-झगड़ा करके यहीं आकर बैठ जाती हैं फिर अपने को मनाये जाने का इंतजार करती हैं । कुछ जल्दी मान जाती हैं पर कुछ रात होने के पहिले ही मानतीं हैं । चैंतरा पर कोई रात में नहीं रूकना चाहता इसलिये कई बार वे बगैर मनायें भी मान ही जाती हैं । टेढ़ी नीमवाली काकी की नई बहु ने माता के चैंतरा के पास की इमली पर लटक कर फांसी लगा ली थी हांलाकि कोई आज तक नहीं समझ नहीं पाया की इतने घने इमली के पेड़ पर जब कोई पुरूष दिन के उजाले में भी नहीं चढ़ पाता तो ऐसे में वह बहु साड़ी पहिने-पहिने घूंघट डाले-डाले कैसे पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर चढ़ गई और लटक भी गई । पर वह बहू जब से उस पेड़ पर लटकी है तब से ही माता के चैतरा पर रात के अंधकार में एक साया घूमता लोगों को दिखाई देने लगा हालांकि किसी ने भी उस साया को कभी देखा नहीं है पर सभी देख लेने का दावा करता है ‘‘चुढ़ैल बन गई है बहु’’ । गांवों में किसी पेड़ पर चुढ़ैल का साया होना आवश्यक और समृद्ध गांव की निशानी माना जाता है । ज्यादातर गांवों में पीपल या इमली के पेड़ पर ही चुढ़ैल होने का दावा किया जाता है । इस गांव में इमली का यह पुराना पेड़ इसकी खानापूर्ति कर रहा था ।
नेताजी माता के चैंतरे पर सभी गांव वालों से मिलेगें । हर पांच साल में नेताजी द्वारा माता के मंदिर में हलुआ चढ़ाया जाता है और हलुआ लेने आने वाले लोगों से नेताजी ‘‘मुझे ही वोट देना’’ का आश्वासन ले लेते हैं । इस बार भी नेताजी ने माता के चबूतरे पर सभी को बुलाया है । गांव के लोग जानते हैं कि नेताजी क्या-क्या कहेगें……केवल वे यह नहीं जानते कि इस बार के गांव में कौन सी नई चीज लगाने का वायदा करेगें । लोगों के लिये यह इस इसलिए भी कौतुहल की बात होती है ताकि वे अगले पांच साल बाद नेताजी को उसी वायदा से पहचान पाते हैं । नेताजी अब तक गांव में स्कूल से लेकर सड़क और नलकूप जैसे मोटे-मोटे वायदे कर चुके हैं जिनके पूरा होने की राह गांव के लोग कभी नहीं देखते अब कौन सा काम होना शेष रह गया है । नेताजी ने मुन्नू से पूछा । मुन्नू ने अभी अभी कम्प्यूटर का नाम सुना था इसलिए उसने कम्प्यूटर लगाने का बोला । नेताजी को भी बात तो जमीं पर उनकी परेशानी यह थी कि वे कम्प्यूटर का उच्चारण सही नहीं कर पाते थे । अब सारी पब्लिक के सामने उनकी हंसी न हो इसलिए उन्होने कम्प्यूटर के सुझाव को रिजेक्ट कर दिया । नेताजी अभी अभी अपने परिवार के साथ राजधानी में एक माॅल में गये थे । उन्हें वह बहुत अच्छा लगा था । उनका मन हुआ कि वे इस बार गांव में माॅल बनाने का वायदा कर दें । पर यह उन्हें ज्यादा ऊंचा ‘‘फेंकू’’ टाइप का वायदा लगा इसलिये इसे भी उन्होने स्वंय ही रिजेक्ट कर दिया । गांव में नदी नहीं थी इसलिए उस पर पुल बनाने की बात भी वे नहीं कर सकते थे तो क्या नदी खोदने का वायदा नहीं किया जा सकता । उन्होने मन ही मन इसका हिसाब भी लगाया। यह तो करोड़ों का प्रोजेक्ट होगा यदि दस परसेन्ट भी उन्हें मिला तो वह कई करोड़ हो जायेगा इसके अलावा वे रेत और गिट्टी का काम भी अपने ही आदमियों से करायेगंे तो वह भी बचेगा । सीमेन्ट का आर्डर अपने साले को दिलवा देगें वो भी बहुत दिनों से कह रहा है उसको भी करोड़ों बच जायेंगें । नेताजी के माथे पर पसीना झलक आया । पर वे जानते थे कि वे नदी को कभी नहीं खुदवा सकते । कागजों में सड़कंे तो बनाई जा सकतीं है, भवन भी बनाये जा सकते हैं, तालाब तो वे कई सैंकड़ा कागजों में बनवा ही चुके हैं पर नदी नहीं बनाई जा सकती । नेताजी के सामने वायदा करने की परेशानी आ खड़ी हुई । उन्होने सोचा कि अब मैया जो कहलवायेंगीं वह वे कह देगें । यह सोचकर उन्हेाने अपने सिर से बोझा उतार फेंका ।
माता के चैंतरा पर गांव के लोग पूरी तैयारी के साथ आये थे । नेताजी को इसका आभाष तक नहीं था । पहिले माता का हलुआ बांटा गया जो सभी ने दो दो बार लेकर खाया । फिर मुन्नू ने सभी को शांति के साथ बैठ जाने का बोला । सारे गांव के लोग शांत होकर बैठ गए । नेताजी ने गला ख्ंाखारा और बोलना शुरू किया । वे बहुत देर तक बोलते रहे । गांव के लोग जम्हाई लेते रहे । उन्होने बताया कि वे कैसे गांव के लिए चिंतित हैं और उन्होने गांव में स्कूल खोलने से लेंकर सड़क और बिजली तक के लिए कितनी मेहनत की है ।
‘‘इस बार आप अपना बहुमूल्य वोट हमें देकर विजयी बनायें …आप देखना इस बार हम विकास की गंगा गांव में बहाकर ही दम लेगें ’’ ।
मुन्नू ने हमेशा की तरह गांव वालों को तालियां बजाने का इशारा किया । पर किसी ने तालियां नहीं बजाईं । नेताजी के चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए । उन्हें अपना हलुआ खिलाना अखरने लगा । अभी तक तो गांव वाले हलुआ खाकर बात बात पर तालियां बजा देते थे पर पर इस बार वे तालियां नहीं बजा रहे थे । नेताजी के गुस्से भरे चेहरे को देखकर मुन्नू डर गया । उसने फिर से गांव वालों को तालियां बजाने का इशारा किया । पर इस बार भी गांव वाले शांत बैठे रहे । नेताजी को गांव वालों का तालियां न बजाना अपना अपमान लगा । वे गुस्से से उठे और चैतरा से उतरने लगे ।
सुखिया नेताजी की इसी हरकत की राह देख रही थी । अपने हाथों में बड़ी सी लाठी लेकर वह नेताजी के सामने आ खड़ी हुई
‘‘काय नेताजी…..काय चले ….अभे तो हम ने जान दे हैं……..’’
नेताजी भयभीत हो गए । उन्हे। भयभीत देखकर उनके सुरक्षाकर्मियों ने उनके चारों ओर घेरा बना लिया । सुखिया भयभीत नहीं थी ।
‘‘काय…..तुमरी जा राशन दुकान तक से गूंहू मिलत नई है और तुम गंगा बहावे की बात करत हो……तनक बैठ जाओ……हमें तो 60-70 साल को हिसाब किताब तुमसे लेने हैं ।’’
नेताजी के माथे पर पसीने की बूंदे झलक आई ।
सुखिया ने चिंगारी छोड़ दी थी । गांव कें लोागें ने उस चिंगारी को लपक ली ।
‘‘जे गेल आये हो नेताजी…..वाके गड्ढा नहीं दिखें का तुम्हें…..का केवल वोट लेवे आत हो’’
‘‘हमरे मोड़ी-मोड़ा पढ़वे दूसरे गांव जात है तुम तो एक स्कूलई नहीं खुलवा सके’’
‘‘काय दें तुम्हें वोट हम……बिजली है नहीं खेत सूखे पड़े हैं….बताओ….’’
‘‘और सुन लो नेताजी……अब हमें तो बेवकूफ समझीओ ने….हम जानत हैं कि हमारे गांव को सरकारी भवन कौनउ के पेट में समा गओ है…..’’
‘‘और भवनई काय…..और बहुत कछु जा पेट में भरो पड़ो है, गांव की नालियें खा गये, गांव को रोडें खा गए अभे और कछु सुई खाने हे……….’’
‘‘अभेे सुई…..तुम्हें एक मौका और चाहिये…….’’
नेताजी भय के मारे मलेरिया के मरीज की भांति कांपने लगे । उन्हें कांपता देख मुन्नू फिर सामने आया
‘‘का कह रहे हो काकी…………अपने नेताजी से कोई ऐसे बात करत है का….’’
‘‘ ये तू चुपई रहीओ….चमचा …..’’
सुखिया की कडक आवाज ने मुन्नू की बोलती बंद कर दी ।
नेताजी कांप रहे थे । सुरक्षाकर्मी उन्हें घेरे हुए थे । सुरक्षाकर्मी उन्हें उनकी कार तक ले गये ।
‘‘देखो नेताजी……अब तो आप जा गांव में कबहुं अईयो ही नहीं……हम गांव वाले तुम्हें जब तक वोट ने देहें जब तक कि हमारे गांव में स्कूल, सड़क और बिजली ने आ जेहै…’
नेताजी ने कार के अंदर के कांच बंद कर लिये थे । उनकी कार गांव की उबड़-खाबड़ रोड पर भी तेज गति से दौड़ रही थी । वे अभी भी सकपकाये थे । उनके कानों में उनके पिताजी के शब्द गूंज रहे थे ‘‘बेटा जिस दिन लोकतंत्र जाग जायेगा उस दिन हम जैसे नेताओं को लोग दौड़ा-दौड़ा कर मारेगें ।
गांव के बाहर बोर्ड लगा दिया गया था और सुखिया बाई के हाथों में एक लाठी दे दी गई थी । बोर्ड में साफ लिख दिया गया था
‘‘नेता गांव में प्रवेश न करें. हम मतदान का बहिष्कार करते हैं’’
निवेदक- समस्त ग्रामवासी

कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर म.प्र.

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।