हर रोज हिंदी दिवस

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पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के “लक्ष्यभेद पब्लिकेशंस” से प्रकाशित होने वाली सर्वप्रथम हिन्दी डिजिटल फॉर्मेट की पत्रिका “लक्ष्यभेद हिंदी ई-पत्रिका” के वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है। आज आपके सामने प्रस्तुत है रचनाकार आशा बंसल की एक कविता जिसका शीर्षक है “हर रोज हिंदी दिवस”:

हिंदी भाषा भारत की निराली है,
हिंदी दिवस की करें हम तैयारी है,
भावों की अभिव्यक्ति करती यह निराली है,
नहीं कोई भाषा हमें इसको छोड़ प्यारी,
पूर्व कबीर ज्ञानी सब हिंदी में लिखते आए हैं,
भारत की उज्जवल भाषा का गौरव बढ़ाते आए हैं,
हमें फक्र है अपनी भाषा की आजादी का,
नहीं अंग्रेजी रूपी गुलामी का ,
यद्यपि अंग्रेज छोड़ गए भारत में अपनी भाषा है ,
लेकिन भारत में हिंदी भाषा का ही बोलबाला है,
आइए हिंदी दिवस को हम रोज मनाए,
पूरे देश में हम हिंदी भाषा का परचम लहराए ,
युगो युगो तक अमर रहे हिंदी भाषा का नाम,
नतमस्तक हो हम हिंदी भाषा को करे सलाम ।

जय हिंदी भाषा जय भारत।

परिचय- आशा बंसल, सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।