
एक पुस्तक बोली बच्चों से,
जितना मुझे पढ़ जाओगे।
उतने ही गूढ़ रहस्य मेरे,
बच्चों तुम समझ पाओगे।।
मुझमें छिपे रहस्य हजारों,
सारे भेद समझ जाओगे।
दुनियाँ के तौर-तरीकों से,
तुम परिचित हो जाओगे।।
मुझे ही पढ़कर कलाम ने,
पाया है जग में सम्मान।
नित अध्ययन कर मेरा,
विवेकानंद बने महान।।
नित करो अध्ययन तुम मेरा,
जग में रोशन हो जाओगे।
सपना पूरा होगा तुम्हारा,
गीता सा सम्मान पाओगे।।
नवनीत शुक्ल(शिक्षक)
फतेहपुर, भारत

