
भूख से तड़पतों के
सर पर हाथ रख दे
मौला मेरी गुज़ारिश
इस भूख से बचा ले।।
प्यास में जुबां की
बस आरज़ू समझना
आबरू इसी में
उस प्यास को बुझा दे।।
लाखों थपेड़े मुझ पर
हर चोट सह रहा हूँ
बाती महज़ बची है
बिन तेल जल रहा हूँ।।
चाहत नही है कोई
महफूज़ सबको रखना
ज़ालिम के हर सितम में
मुहब्बत नवाज़ देना।।
दौर-ए जहां में रंजिश
इंसानियत बचा ले
मेरी आरज़ू है तुझसे
बस आबरू बचा ले।।
ज़हीर अली सिद्दीक़ी
आय. सी.टी.मुम्बई

