
धूप से कभी छांव तक नहीं पहुँचा
शहर का आदमी गांव तक नहीं पहुँचा
चकाचौंध में इस तरह खोया रहा
अनेपन कभी लगाव तक नहीं पहुँचा
धन दौलत नशा शराब और कबाब का
किसी की पीड़ा भाव तक नहीं पहुँचा
जिंदगी ऐसी भला किसी काम की यारों
जो किसी के जख्म घाव तक नहीं पहुँचा
-किशोर छिपेश्वर”सागर”
बालाघाट

