आज के बड़े लोग

rambahadur

जिनके मन में पंख और पैर  में पहिये

उनके सिर पर भार  और  तेज रफ्तार
जीवन में भागम- भाग एवं  अंधी दौड़
उनमें गहमा- गहमी और  वाद -विवाद
जहां गर्म हो बाजार  लोग  रहें  बेजार
मन  है उचंगा  बह रही उल्टी  ही गंगा
बदल गयी रीत अब झूठी है  सब प्रीत
भीतर होते  रावण  बाहर  दिखते राम
कलंकित होती  सीता मैली  हुई गीता
बहरे हैं शासक तो  गूंगे भये सब लोग
कानून  हुआ अंधा काला इनका धंधा
छोटी  है चादर  लेकिन  लम्बे होते पैर
हर घर के अन्दर अपनों  से  ही है डर
#राम बहादुर राय “अकेला”
एम.ए.(हिन्दी, इतिहास ,मानवाधिकार एवं कर्तव्य, पत्रकारिता एवं जनसंचार),बी .एड.
मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार,
बलिया (उत्तर प्रदेश)

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