सरकारी स्कूल में शिक्षा के स्तर में सुधार हेतु कुछ बुनियादी बातें l

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manila kumari

बार बार सबके मन में यह प्रश्न उठता है कि  शिक्षा के क्षेत्र में इतना खर्च करने के बाबजूद आखिर सरकारी विद्यालय में शिक्षा के स्तर में सुधार क्यों नहीं हो रहा है l सरकारी स्तर पर कई कार्य किए भी जा रहें हैं,  पर सुधार की गति अत्यंत धीमी है l मैंने  ग्यारह वर्ष के अंतराल में  निजी विद्यालय, सरकारी विद्यालय, सरकारी कॉलेज और व्यवसायिक कॉलेज में अध्यापन का कार्य किया है l इस दरम्यान मुझे कुछ बुनियादी बातें पता चली हैं, जो कहीं न कहीं शिक्षा के स्तर में सुधार में बाधक बन रहीं हैं l कुछ मिथकों का भी दुष्प्रचार इस प्रकार किया जा रहा है, जो वास्तविकता में है ही नहीं l पहले मिथकों की चर्चा कर लें फिर बाधाओं और उसके समाधान पर चर्चा करूँगी l
कुछ प्रचलित मिथक
*  निजी स्कूल में शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा है और सरकारी में बहुत  खराब l
*निजी स्कूल के शिक्षक सरकारी स्कूल के शिक्षकों की तुलना में ज्यादा काबिल होतें हैं l
* निजी स्कूल में पढ़ाई करने मात्र से बच्चे का भविष्य बन जाता है l
* शिक्षा के स्तर में सुधार की जिम्मेदारी केवल और केवल शिक्षक की है l
* जिस स्कूल का परीक्षा परिणाम अच्छा होता है,  वहाँ दाखिला कराने मात्र से बच्चे के शिक्षा के स्तर में सुधार होगा l
* सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा विशेष कर ग्रामीण क्षेत्र में पढ़ने वाला  बच्चा प्रायः कमजोर होता है और किसी परीक्षा में अच्छा अंक नहीं ला सकता है l( यह मिथक शहरी क्षेत्र में रहने वालों को लगता है )
* यदि शिक्षक बहुत अधिक डिग्रीधारी होगा, तो ही वह बच्चों को बेहतर पढ़ा सकता है l
* जिस शिक्षक को सबसे अधिक पुरस्कार प्राप्त हैं, उसके छात्र भी बेहतर ही होंगे l
* जो जितना  अधिक भाषणबाजी करता है, वह उतना ही अच्छा शिक्षक है l
* बच्चों की तरह उन्हीं के जैसे कपड़े पहनने पर बच्चा शिक्षक को अपने बीच का समझेगा l (यदि इस बात में कुछ भी सच्चाई होती तो बच्चा  अपने माँ बाप को अपना नहीं समझता क्योंकि वे भी बच्चे के जैसे समान रंग के कपड़े नहीं पहनते हैं l)
* जो चुप रहता है, चुपचाप रहता है, उसको कुछ भी नहीं आता हैl (जबकि चुप वही रहता है जिसके पास गहन ज्ञान हो और  “अधजल गगरी छलकत जाए “l)
* जितना अधिक समय शिक्षक छात्रों को पढ़ाएगा उतना अधिक छात्र सीखेगा l
शिक्षा के स्तर में सुधार के क्षेत्र में बाधाएँ
–  शिक्षा केवल एक ही प्रकार के बौद्धिक क्षमता वाले बच्चों को नहीं दी जाती है l शिक्षा अलग अलग बौद्धिक क्षमता वाले छात्रों को  दी जाती है l फिर नियम केवल कमजोर छात्रों को ध्यान में रखते हुए ही शिक्षा के स्तर को अत्यधिक सरल बनाने से कुशाग्र बुद्धि वाले छात्रों को अत्यधिक समय मिल जाता है समय बर्बाद करने के लिए l
– कक्षा आठ तक फेल  न करने के कारण बच्चों में फेल होने का कोई भय नहीं है,  इस कारण बहुत से बच्चे पढ़ाई पर ध्यान ही नहीं देतें हैं और जब कक्षा नवम में पहुँचते हैं तब वे पढ़ना और लिखना भी नहीं जानते हैं l यहाँ तक कि  अ, आ, इ ई  भी नहीं जानते हैं l
– जिस तरह पाँच ऊँगली समान नहीं होती, उसी तरह सभी बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता l कुछ बच्चे खेल कूद में बहुत अच्छे होते हैं ,  तो कुछ गायकी में, तो कुछ लेखन में l  किसी को गणित पढ़ना अच्छा लगता है,  किसी को भाषा, किसी को समाजशास्त्र तो किसी को विज्ञान l पर कक्षा दशम तक हमारे पाठ्यक्रम में सभी विषयों को पढ़ना अनिवार्य होता है l इस कारण जिन बच्चों को पढ़ाई पसंद नहीं वे पिछड़ जाते हैं l
– शहरी क्षेत्र के बच्चों को केवल पढ़ाई करना होता है जबकि ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे पढ़ाई के अलावा घर और खेती का काम भी करते हैं, जिससे उन्हें पढ़ने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है l यदि वे छह घंटे या उससे अधिक समय  तक स्कूल में रहते हैं तो उन्हें स्वाध्ययन का समय नहीं मिलता है l
– प्रायः ग्रामीण क्षेत्र में वैसे ही बच्चे पढ़ते हैं जो पढ़ाई में अत्यधिक कमजोर होते हैं या जिनके माता पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती है l इस कारण ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों का प्रायः शैक्षिक स्तर निम्न  होता है l इसका यह कतई मतलब नहीं कि ग्रामीण क्षेत्र में पढ़ने वाला हर बच्चा कमजोर होता है l कुछ बच्चे अत्यंत कुशाग्र भी होते हैं,  पर उनको अच्छे अंक नहीं आते हैं l इसका कारण उनकी कॉपी जाँच इस मानसिकता से की जाती है कि ग्रामीण क्षेत्र का बच्चा तेज नहीं होगा और उसे इस मानसिकता से ग्रस्त कुछ परीक्षक औसत अंक दे देते हैं l
– निजी विद्यालय हो या सरकारी, किसी भी विद्यालय में पढ़ने वाले  उसी छात्र का रिजल्ट अच्छा होता है,  जिसके अभिभावक बच्चे की पढ़ाई के प्रति जागरूक होते हैं l अन्यथा दोनों ही प्रकार के विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों का परीक्षा परिणाम अच्छा नहीं रहता है l
– मिडिया में बार बार सरकारी स्कूल के शिक्षक की कमियों को जोरशोर से प्रसारित किया जाता है l कुछ प्रश्न पूछने पर सरकारी शिक्षक उनका उत्तर नहीं दे पाते हैं तो बच्चों को क्या पढ़ाएंगे, प्रश्न उठाते हैं l शिक्षक यदि कक्षा 1,2,3,4 को पढ़ाता है तो उसका ज्ञान उसी स्तर का होगा क्योंकि वह उन्हीं चीजों को अच्छे से पढ़ाने की कोशिश करता है ताकि बच्चे अच्छे से सीख जाएँ l और प्रश्न के उत्तर न देने की बात जहाँ तक आती है, तो यह जरूरी नहीं कि शिक्षक हैं तो हर प्रश्न का उत्तर उसे आता ही होगा l कभी कभी अचानक बाहरी व्यक्ति द्वारा प्रश्न पूछने पर डर से वे सरल प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाते हैं l ऐसा करने से निस्वार्थ काम करने वाले शिक्षक आहत होते हैं l किसी भी व्यक्ति से उसका सौ प्रतिशत लाभ तभी लिया जा सकता है, जब वह अपने काम को किसी के डर से नहीं बल्कि स्वेच्छा से करें l
– शिक्षा के क्षेत्र में किए जाने वाले प्रयोगों का परिणाम हर कोई  एक ही साल में चाहता है पर शिक्षा के क्षेत्र में किए जाने वाले प्रयोग  का परिणाम दूरगामी होता है l झारखण्ड के कई कई जिले के सरकारी विद्यालयों में परीक्षा से तीन  माह पूर्व से अतिरिक्त कक्षा लेने का प्रावधान है l इससे छात्रों को स्वाध्ययन के लिए पूरा समय नहीं मिलता है l मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐसा करने से शिक्षक और छात्र दोनों का समय बर्बाद होता है l जब तक छात्र स्वयं से न पढ़ना चाहे उसे कोई नहीं पढ़ा सकता है l शिक्षक जब स्वयं ही हताश होगा तो वह छात्रों को पढ़ने के लिए कैसे प्रेरित करेगा l
– शिक्षा के क्षेत्र में किए जाने वाले प्रयोग का दूरगामी परिणाम होता है l अतः कोई भी नियम लागू करने के बाद उससे परिणाम प्राप्त करने के लिए उसे वक्त देना होगा न कि  एक एक वर्ष में नया नियम लागू करते हुए अच्छे परिणाम की  चाहत रखना चाहिए l
– जो लोग कामचोर होते हैं, वे हर हाल में फांकी मारते हैं l जितनी भी मॉनिटरिंग व्यवस्था लागू की जाए l जो काम करने वाले लोग अनावश्यक दखलंदाजी से हताश जरूर होते हैं,  जिसका असर शिक्षा पर पड़ता है l
– ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है l किसी किसी विद्यालय में एक या दो ही विषय के  शिक्षक हैं जो सभी विषयों को कैसे पढ़ाएँ? बहुत बड़ा प्रश्न है?
  आजकल के छात्रों के पास पुस्तक रहती है l वे यदि  पढ़ना जानते हैं तो पुस्तक पढ़कर ज्ञान प्राप्त कर लेते है l शिक्षक बच्चों को केवल किताबी ज्ञान नहीं देता है बल्कि उनके व्यक्तित्व को निखारने का भी काम करता है और शिक्षक की कमी से यह संभव नहीं है l
-समाज में शिक्षक को सबसे हेय दृष्टि से देखा जाता है, जो उसके काम करने के जज़्बे को कहीं न कहीं प्रभावित करता है l
-राजनेताओं और पदाधिकारियों से काम करने वाले ईमानदार शिक्षक सम्मान की उम्मीद करता है पर वहाँ से उसे दुत्कार के सिवा कुछ नहीं मिलता है l शिक्षक की समस्या का समाधान कम और उन पर बंदिश ज्यादा होने के कारण उनका काम प्रभावित होता  है l
समाधान
# शिक्षक को अपने छात्रों के साथ स्कूल के समय में अधिक से अधिक समय रहने देना होगा l जहाँ तक हो सके उससे पेपर वर्क कम माँगा जाए l
# नई  नई योजना लागू करने से पहले तकनीक का इस्तेमाल करते हुए सब शिक्षकों की राय ली जानी चाहिए, ताकि वह योजना प्रभावी हो l योजना को पूरा समय लेकर लागू करना होगा न कि आनन फानन में लागू करके दिखावा करना होगा l
# जिस तरह बच्चों के प्रति शिक्षक दंडात्मक कार्यवाही नहीं कर सकता है, उसी तरह यदि कोई शिक्षक किसी योजना पर नकारात्मक  मंतव्य रखता है तो उस पर दंडात्मक कार्यवाही नहीं होनी चाहिए l कई शिक्षक इस डर से अपना मंतव्य नहीं रखते कि यदि वे कुछ बोलेंगे तो उन्हें दण्ड भुगतना पड़ेगा l
# शिक्षक पठन पाठन का करता है फिर भी वह हर समय इस बात से डरा रहता है कि न जाने कब कौन साथ नया फरमान आ जाए l
# जहाँ तक उच्च कक्षा के छात्रों को पढ़ाने की बात है वहाँ भी एक ही शिक्षक एक घंटे में छात्रों को सभी विषय पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकता है पर उनके कार्यों की समीक्षा करने के लिए तथा विषय की गहराई तक छात्रों को ले जाने के लिए विषय विशेषज्ञ की आवश्यकता होती है l उच्च कक्षाओं में सभी विषय के विषय विशेषज्ञ शिक्षकों को नियुक्त करना होगा l
# शिक्षकों पर हर कोई चाहे वह सामाजिक व्यक्ति हो, चाहे वह धार्मिक व्यक्ति हो या चाहे राजनितिक व्यक्ति सभी प्रायः यह आरोप लगाते हुए दिखते हैं कि मास्टर तो कुर्सी तोड़ते हैं, कुछ काम नहीं करते हैं और इतना वेतन लेते हैं l ऐसे लोगों को  एक बार अपने घर में झाँक कर देखना चाहिए और शिक्षक पर आरोप लगाना चाहिए l अपने घर में एक या दो बच्चा को अकेले दो चार घंटे सँभाल लें और कुछ अच्छा सीखा दें फिर वे शिक्षक पर दोषारोपण करें l जो लोग आधा घंटा अपने बच्चे को ढंग से रख नहीं पाते हैं वैसे लोग ही शिक्षक पर कुर्सी तोड़ते हुए पैसे लेने का आरोप लेते हैं l इस मानसिकता से सभी को चाहे वह सामाजिक व्यक्ति हो,  चाहे धार्मिक व्यक्ति हो या राजनितिक व्यक्ति हो निकलना होगा l
# स्वार्थ के इस दौर में भी शिक्षक निस्वार्थ भाव से छात्रों  का भविष्य गढ़ता है, वह सम्मान का पात्र होना  चाहिए न कि अपमान का l इतिहास गवाह है कि बड़े से बड़े ज्ञानी को ज्ञान उनके गुरु के दिशा निर्देश से ही प्राप्त हुआ है l शिक्षकों का चयन भी उनके इसी भाव के आधार पर करना होगा l
 ( क्रमशः… )
#डॉ मनीला कुमारी

परिचय : झारखंड के सरायकेला खरसावाँ जिले के अंतर्गत हथियाडीह में 14 नवम्बर 1978 ई0 में जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल में हुआ। उच्च शिक्षा डी बी एम एस कदमा गर्ल्स हाई स्कूल से प्राप्त किया और विश्वविद्यालयी शिक्षा जमशेदपुर वीमेन्स कॉलेज से प्राप्त किया। कई राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय सम्मेलनों में पत्र प्रस्तुत किया ।ज्वलंत समस्याओं के प्रति प्रतिक्रिया विविध पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है। प्रतिलिपि और नारायणी साहित्यिक संस्था से जुड़ी हुई हैं। हिन्दी, अंग्रेजी और बंगला की जानकारी रखने वाली सम्प्रति ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालय में पदस्थापित हैं और वहाँ के छात्र -छात्राओं को हिन्दी की महत्ता और रोजगारोन्मुखता से परिचित कराते हुए हिन्दी के सामर्थ्य से अवगत कराने का कार्य कर रहीं हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।