सूखे पत्ते

vivek

वो सूखे पत्ते पलाश के ।
टूटे सितारे आकाश से ।
खोजते रहे जमीं अपनी ,
कल तक जो थे साथ से ।

क्यों तरसती रहीं निगाहें  ,
उजाले थे वो आभास के ।
क्यों टूटते रहे वो घरौंदे  ,
जो घरौंदे थे विस्वास के  ।

न रूठकर भी रूठे रहे ,
वो हमसफ़र भी खास से ।
जीते रहे वास्ते जिनके ,
वो अंजान रहे इस बात से ।

        #विवेक दुबे

परिचय : दवा व्यवसाय के साथ ही विवेक दुबे अच्छा लेखन भी करने में सक्रिय हैं। स्नातकोत्तर और आयुर्वेद रत्न होकर आप रायसेन(मध्यप्रदेश) में रहते हैं। आपको लेखनी की बदौलत २०१२ में ‘युवा सृजन धर्मिता अलंकरण’ प्राप्त हुआ है। निरन्तर रचनाओं का प्रकाशन जारी है। लेखन आपकी विरासत है,क्योंकि पिता बद्री प्रसाद दुबे कवि हैं। उनसे प्रेरणा पाकर कलम थामी जो काम के साथ शौक के रुप में चल रही है। आप ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं।

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