“बापू का भात”

nayana aarti

जग्गु अचानक ठोकर खा कर गिरा था या खाली पेट चक्कर खा कर पता नहीं पर सब दौडकर उठाते तब तक उसकी साँसे पुरी हो चुकी थी।
मैयत से आकर दो घड़ी को उसके पास बैठे सभी अपने-अपने काम पर निकल गये थे। जिवल्या तो शायद कुछ ठीक से समझ भी ना पाया था । वो बाहर खेलता रहा।
“अम्मा! अम्मा! उठ ना कब तक यही बैठी रहेगी। बहुत जोरों की भूख लगी हैं.” जिवल्या साड़ी का पल्लू खींचकर उसे उठाने की कोशिश कर रहा था।
वो तिरपाल और फूस से अस्थायी बनी झोंपड़ी के एक कोने मे चुपचाप अपने बढे हुए पेट पर हाथ धरे आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठी थी। अभी कुछ दिन पहले ही तो आए थे यहाँ रोटी की जुगाड में. वो सात माह की पेट से थी. गाँव में तो भूखे मर जाते तो इस हालत मे भी जग्या लिवा लाया था.
“अम्मा! देख तो सही, सुगना मौसी, कानी ताई, कम्मो फुआ सब लोग कितना सारा भात और चटनी ..रख के गये है। वो उसे उठने की बार-बार गुहार लगा रहा था।
पेट को सम्हालते वो हौले से उठी और थाली मे भात परोस कर खिलाने लगी।
“माई तू भी खाले। पता नहीं कल मिले ना मिले।”
” क्यों ऐसा क्यो कह रहा” उसे सीने से लगाते उसके आँसू झरझर बहने लगे।
“कल थोडे ना कोई लाकर देगा। वो फुआ कह रही थी आज तेरा बाप मरा है ना तो तेरे घर चुल्हा नही जलेगा। इस वास्ते भात रख के गई है वो।”
“तो क्या कल…”
“अब हमारे पास बापू कहाँ है मरने के लिए।”

 

#नयना(आरती) कानिटकर

शिक्षा:- एम.एस.सी,  एल.एल.बी

संप्रति:- पति के चार्टड अकाउँटंट फ़र्म मे पूर्ण कालावधी सहयोग

रुची:- हर वो रचनात्मक कार्य जो मन को सूकून दे.

पठन, पाठन, गायन, सिलाई-कढाई आदी

 

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