रोज़ की तरह आज सुबह भी
ले आया हूँ एक खूबसूरत आज
मजबूरियों के कत्लखाने में
कि उतारकर खाल इसकी
बोटी-बोटी कर
बेच दूँगा शाम तलक
ताकि भर सके
मेरी और मेरे परिवार की
ज़रूरतों का पेट
ये दिन………
जिसे कुदरत ने पैदा होते ही
सौंपा था मेरे हाथ में
ख्वाहिशों की चादर में लपेट कर
लेकिन मैंने कर दिया कत्ल इसका
एक बेहतर कल की आस में
कंस ने तो सिर्फ
आठ नवजात मारे थे
अमर होने की चाह में
लेकिन मैंने तो मार डाले हज़ारों आज
सिर्फ एक बेहतर कल की आस में
जालिम बादशाहों की सूची में
होना चाहिए मेरा नाम शीर्ष पर
क्योंकि मैं तो रोज़ कत्ल करता आया हूँ
और रोज़ करता ही रहूँगा
जब तक कोई आज कृष्ण बनकर
मुझे मुक्त न कर दे
एक बेहतर कल की अभिलाषा से..!
भरत मल्होत्रा।
परिचय :-
नाम- भरत मल्होत्रा
मुंबई(महाराष्ट्र)
शैक्षणिक योग्यता – स्नातक
वर्तमान व्यवसाय – व्यवसायी
साहित्यिक उपलब्धियां – देश व विदेश(कनाडा) के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों , व पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
सम्मान – ग्वालियर साहित्य कला परिषद् द्वारा “दीपशिखा सम्मान”, “शब्द कलश सम्मान”, “काव्य साहित्य सरताज”, “संपादक शिरोमणि”
झांसी से प्रकाशित “जय विजय” पत्रिका द्वारा ” उत्कृष्ट साहितय सेवा रचनाकार” सम्मान एव
दिल्ली के भाषा सहोदरी द्वारा सम्मानित, दिल्ली के कवि हम-तुम टीम द्वारा ” शब्द अनुराग सम्मान” व ” शब्द गंगा सम्मान” द्वारा सम्मानित
प्रकाशित पुस्तकें- सहोदरी सोपान
दीपशिखा
शब्दकलश
शब्द अनुराग
शब्द गंगा