फागुन अब मुझे नहीं रिझाता है

sushil

फागुन अब मुझे नहीं रिझाता है,
जबसे शब्द कोषों में..
प्यार की परिभाषा बदल गई।

जबसे रंग भूल गए अपनी असलियत,
जबसे तुम्हारी मुस्कान कुटिल हो गई..
जबसे प्यार के खनकते स्वर कर्कश हो गए,
तबसे फागुन अब मुझे नहीं रिझाता है।

जबसे रिश्तों में पैबंद लगने लगे,
जबसे प्रेम के स्वर मंद पड़ने लगे..
जबसे अयोग्यताओं का
आलिंगन होने लगा,
जबसे स्पर्श की आकांक्षाओं
का पालन होने लगा।

जबसे प्रेम की परिधियाँ,
टूटकर बिखरने लगीं..
जबसे घृणा की बेल बढ़ने लगी,
तबसे फागुन,अब मुझे नहीं रिझाता है।

जबसे कोई साथ देने का वादा तोड़ गया,
जब मेरा मन मुझे नितांत अकेला छोड़  गया..
जबसे शब्द अपने अनुबंधों से बिखरने लगे,
जब से आईने अपने प्रतिबिम्बों से मुकरने लगे..
तबसे फागुन अब मुझे नहीं रिझाता है।

      #सुशील शर्मा

परिचय : सुशील कुमार शर्मा की संप्रति शासकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय(गाडरवारा,मध्यप्रदेश)में वरिष्ठ अध्यापक (अंग्रेजी) की है।जिला नरसिंहपुर के गाडरवारा में बसे हुए श्री शर्मा ने एम.टेक.और एम.ए. की पढ़ाई की है। साहित्य से आपका इतना नाता है कि,५ पुस्तकें प्रकाशित(गीत विप्लव,विज्ञान के आलेख,दरकती संवेदनाएं,सामाजिक सरोकार और कोरे पन्ने होने वाली हैं। आपकी साहित्यिक यात्रा के तहत देश-विदेश की विभिन्न पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में करीब ८०० रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। इंटरनेशनल रिसर्च जनरल में भी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है।
पुरस्कार व सम्मान के रुप में विपिन जोशी राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान ‘द्रोणाचार्य सम्मान-२०१२’, सद्भावना सम्मान २००७,रचना रजत प्रतिभा साहित्य सम्मान-२०१६ सहित शिक्षा गौरव सम्मान-२०१६
एवं स्वर्ण प्रतिभा साहित्य सम्मान २०१७ भी मिल चुका है।

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