पुरुष -वक़्त के साथ बड़े नही होते 

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आज कि कविता एक नितान्त भाव है. जहाँ मैं पुरुष समाज की मांसिक स्तिथि को समझने की कोसिस कर रही हूं.
कल मेरा सात साल का बेटा मुझसे पूछ बैठा, माँ तुम सबसे ज्यादा प्यारी किसे करती हो, उस वक़्त मै वात्सल्य मे डूबी असीम आनंद से सरोबार थी.
मैने सहज ही कह दिया तुमसे और तुम्हारे dady से. पर बेटे को ये उत्तर स्वीकार न था, उसका हठ था की जैसे वो सबसे ज्यादा प्यार अपनी माँ से करता है वैसे ही मुझे सबसे ज्यादा प्यार अपनी माँ अर्थात उसकी नानी से करना चाहिए. मै उसकी बाल चपलता और तर्क के आगे नतमस्तक हो गयी.
पर अगली रात जब उसके dady घर पर थे उसने यही प्रश्न अप्ने dady पर दाग दिया. dady आप सबसे ज्यादा प्यार किसे करते हैं. उसके dady ने सहज ही कह दिया कि मै सबसे ज्यादा प्यार अपने mummy dady अर्थात तुम्हारे dada dadi से करता हूं. मेरे बेटे को इस जवाब से बहुत आघात पहुंचा, उसकी अपेक्षा थी की dady कहेन्गे तुमको और तुम्हारी mummy को. उसे ये उपेक्षा स्वीकार न हुई, उसने हमारे हक मे अपने dady से बहस की
हमने उसे शान्त किया, उसे समझाया और उसे सुलाया. पर ये वाक्या मेरे जहन से न हटा, पत्नि हूं शायद उपेक्षा स्वीकार न कर पाई, मै मंथन कर रही थी, मै निरन्तर चिन्तन कर रही थी.
सहसा मुझे समझ आया कि हम स्त्रिया अपना मायका पीछे छोड़ कर आते हैं और नए लोगों को पूरे दिल से अपना लेते हैं पूर्ण समर्पण के भाव से.
पर पुरुष वही खड़े रहते हैं, वो वक़्त के साथ बड़े नही होते हैं हम अपनी जडे छोड़ कर आते हैं, पुराने रिस्ते तोड़ कर आते हैं. हम नया पेड़ लगाते हैं. जहाँ हम स्व्यम जड हैं. हमारा अपना तना है. हमारी अपनी पत्तियाँ हैं. हमारे फ़ल हैं. हमारे फ़ूल हैं. और हम स्व्यम अद्र्स्य हो जाते हैं उस पेड़ को पानी देते देते.
पर पुरुष वही खड़े होते हैं और वो वक़्त के साथ बड़े नही होते हैं.

                          #श्वेता जायसवाल  ‘सुरभि’

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