कहाँ हो तुम ?

devendr soni

पुस्तक समीक्षा……………….

किसी भी विधा में लेखन हो उसका भावनाओं से गहरा सम्बंध होता है फिर यहां तो सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह – कहाँ हो तुम की लेखिका का नाम ही भावना है ! उनकी विविध भावनाओं की अभिव्यक्ति ही इस संग्रह को सार्थकता , पठनीय और अपने पुस्तकालय में सुरक्षित रखने को बाध्य करती है ।
87 रचनाओं के इस काव्य संग्रह को – ” त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ” जैसे अनुकरणीय समर्पण के साथ वे स्वयं कहती हैं – मेरी रचना ही मेरा आईना है ।
पूर्णतः सहमत हूँ मैं भावना जी के इस कथन से क्योंकि मै सदा से ही यह मानता आया हूँ कि – हमारा लेखन ही हमारे व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचायक होता है । भावना जी इसमें खरी उतरती हैं । एक बात और मै हमेशा दोहराता भी हूँ और रचनाकारों से यह अपेक्षा भी रखता हूँ – हमारा लेखन सकारात्मक हो , यथार्थ आधारित हो ताकि पाठकों में , समाज में व्याप्त नैराश्य का भाव हट सके । यही कारण है कि साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है। लेखन करते समय इसे आत्मसात करना चाहिए।
इस संग्रह में मुझे लेखिका का आत्मकथ्य देखने को नही मिला मगर अंतिम पेज पर छपी उनकी कविता को ही उनका आत्मकथ्य मान रहा हूँ । हर पाठक अपने हिसाब से इसका अलग अलग अर्थ निकालेंगे पर मेरे लिए यह रचना उस नियंता को समर्पित है ,  जिसके बिना हमारा पूर्ण होना या अपने जीवन को सफल मानना बेमानी ही होता है । वे स्वयं कहती हैं –
प्रगाढ़ मौन के हाथों में तराशी गई
तेरी प्रतिमा में झलकते हैं
मेरी ख्वाहिशों के रंग
और अंत में कहती हैं –
तुम्हारे बगैर हमारा पूर्ण होना
कहाँ है सम्भव ?
पढ़ें और विचार करें क्या यह हकीकत नहीं है।
भावना जी की हर रचना प्रभावित करती हैं । लगता है जैसे उन्हें पढ़ते हुए हम भी एक अलग दुनिया में पहुंच जाते हैं । जहाँ हमारे मन को सुकून देने वाले हर भाव मौजूद होते हैं ।
संग्रह के आमुख में रस्तोगी जी ने सही लिखा है – आस्था और विश्वास ही प्रेम का परम तत्त्व है। यह भावना जी की कविताओं में साफ तौर पर नजर आता है । मैं भी मानता हूँ – प्रेम को व्याख्यायित नही किया जा सकता दरअसल वह हमारे ही अंदर मौजूद होता है और इसी आधार पर सारी सृष्टि संचालित है। यही कारण है कि भावना जी की कविताओं को लौकिक होते हुए भी पारलौकिक कहा जा सकता है।
मैं फिर कह रहा हूँ भावना जी के इस संग्रह की हर रचना आपको यह एहसास कराएगी कि आपने वाकई वही पढ़ा जो आप हमेशा से पढ़ना चाहते रहे हैं ।
विश्वगाथा प्रकाशन , सुरेंद्र नगर , गुजरात का यह उत्कृष्ट प्रकाशन है ।
संग्रह के सम्पादन और मुद्रण की गुणवत्ता से समझौता न करना भी इसे महत्वपूर्ण बनाता है। लेखिका भावना भट्ट जी के साथ विश्वगाथा प्रकाशन के श्री पंकज त्रिवेदी जी के अप्रत्यक्ष ही सही परअकथनीय योगदान को भुलाया नहीं जा सकता ।
उन सभी साहित्यिक मित्रों से मेरा यह आग्रह है – साहित्य लेखन के प्रोत्साहन और उसकी अभिवृद्धि के लिए मात्र एक सौ पचास रुपए भेजकर इसे अपने पुस्तकालय में संजोना चाहिए।

           #देवेन्द्र सोनी

               इटारसी ( मध्यप्रदेश )

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।