उलझनों के झुनझुने में अटकी, किसी चौराहे पर.. मेरे ही खिलाफ चौरंगी सी खड़ी, यह औढर जिंदगी। क्या पता किस ओर करवट ले जाए, किस ओर नहीं, या फिर बढ़ चले सन्नाटे को चीरती हुई मृग मरीचिका.. लिए हुए,बेमतलब के ख्वाब दिखाते हुए,बेपता है यह, देखा है कि,इसने जो भी […]
काव्यभाषा
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