रोशनी 

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aashutosh mishra
हां रोशनी वह शब्द है। यह एक उर्दू शब्द है। जिसे हिन्दी में प्रकाश आंग्ल में लाइट तथा स्थानीय भाषाओं में विभिन्न नामों से जाना जाता है। अब नाम और भाषा से हमें का लेना खैर। रोशनी का हमारे जीवन मा बहुत बड़ा महत्व है। एक कहावत भी है रोशनी नही तो कुछ नही। अब रही बात किस चीज की। हां भाई रोशनी भी तो कई प्रकार की होती हैं एक से बढ़कर एक जैसे रेलवे स्टेशन बस टैंड चौराहे तथा  रास्ते में बैठकर ठरकी लोग कहते हैं। एक से बढ़कर एक हैं। चाहे उनके आंख की रोशनी गायब हो। यह भी हो सकता है कि जिसे वह अपनी कमजोर रोशनी के संग देख रहा है। उससे बड़ी रोशनी उसके घर में किसी और की रोशनी रहती हो खैर। बात हम रोशनी के प्रकार की कर रहे थे। एक रोशनी वह होती है जो आंखो में होती है यदि यह रोशनी खत्म तो समझ लीजिए बहुत कुछ खत्म। इस रोशनी के खत्म होने के पश्चात हम कोई भी रोशनी नही देख सकते। वैसे एक जुगाड है आभास कर सकते हैं। “”आशा”” हां आशा यह भी एक प्रकार की रौशनी है जो हमें बहुत आगे तक ले जाती है। यदि यह रोशनी जरा सी डगमगाई तो जीवन की रोशनी खत्म। एक रोशनी और भी है। टार्च वाली इस रोशनी का इतिहास बड़ा पुराना है। पहले मशाल वसाल जो थी उसीने टार्च का रूप ले लिया। पूर्णतया उसी प्रकार जैसे कोई रोशनी विहीन व्यक्ति सेव सूव कराकर सुन्दर बनने की कोशिश करता है परन्तु कब उसके सेल खत्म हो जाएंगे पता नही। देखने में मिलता है लगभग प्रत्येक जगह  । मूबाइल में भी रोशनी होती है। यह रोशनी बिलकुल उस प्रकार की होती है जैसे कोई लड़की मेकअप करके सुन्दर तो बन जाती है और अपने आप पर बहुत घमंड करने लगती है। परन्तु  उसे पता होता है कि यह मेकअप किस हालात में और कब तक चलता है। जब तक वह उतरने वाला होता है। उससे पहले वह पचास गोलगप्पे ठूंस कर घर वापस आ जाती है। उसी प्रकार फोन चार्जचार्जर की ओर भागता है। एक रोशनी और होती है जो व्यक्ति को आशु ही सीमा तक पहुंचाती है। इस रोशनी को बहुत कम लोगों को इंतजार होता है। अक्सर लोग बड़ी बड़ी लाइटों की रोशनी में ही पसंद करते हैं खैर। जो भी हो रोशनी हमारे जीवन में अति आवश्यक है। इसे बचाकर रखना चाहिए। फिर वह चाहे मुख, टार्च, मोबाइल, आशा प्रतीक्षा, नेत्र आदि चाहे जिसकी हो।।

#आशुतोष मिश्र 
तीरथ सकतपुर 

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matruadmin

2 thoughts on “रोशनी 

  1. बेहतरीन,,,,,

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।