छायावाद के कवि सुमित्रानंदन पंत 

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rajesh sharma

   सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 को हुआ। हिंदी साहित्य में चगयवादी युग के प्रमुख कवियों में पंत जी का नाम प्रमुख है। इनका जन्म अल्मोड़ा जिले के कोसानी बागेश्वर उत्तराखंड में हुआ था। जन्म के 6 घण्टे बाद ही इनकी माता का निधन हो गया था। उनका लालन पालन दादी ने किया। उनके बचपन कस नाम गुंसाई दत्त था। सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे पंत। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा मे हुई। 1918 में वे काशी आये। और उन्होंने क्वीन्स कॉलेज से माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था इसलिए उन्होंने अपना नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। इलाहाबाद के म्योर कॉलेज से बारहवीं में दाखिला लिया।
   1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के साथ असहयोग आंदोलन में भाग लिया। अंग्रेजी कॉलेजो का सरकारी कार्यालयों का इन्होंने बहिष्कार किया। और इन्होंने वह कॉलेज छोड़ दिया।
   घर पर ही अध्ययन कर हिंदी,संस्कृत,बंगला व अंग्रेजी भाषाओं का अध्ययन किया।
  आकाशवाणी इलाहाबाद में सलाहकार के पद पर कार्य किया।
 इनके यहाँ के झरने बाग बर्फ पुशो लाता भंवरा गुंजन उषा किरण शीतल पवन तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब प्रतिदिन देख पंत जी ने सहज रूप से कविताओं की रचना की। ये सब उनकी कविताओं में वर्णित है।निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप मर प्रयोग उनकी काव्य की विशेषता हौ।
  उनका व्यक्तित्व बहुमुखी था। एक गज़ब का आकर्षण था उनमें। गौर वर्ण लंबे लंबे घुंघराले बाल रखते थे। ऊंची आवाज में बतियाते थे। शारीरिक सौष्ठव देखते ही बनता था।
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  पंत वृति से शिक्षक थे। अच्छे लेखक थे।उन्होंने कई गीत व कविताएँ लिखी जो कालजयी बनी। रहस्यवाद प्रगतिवाद आंदोलन किए।
  पंत जब सात वर्ष के थे तभी से उन्होंने कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया था। उस समय वे कक्षा चार में पढ़ते थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ:- अनुभूति,महात्मा जी के प्रति,मोह,सांध्य वंदना,वायु के प्रति,श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी के प्रति,आज रहने दो यह ग्रह काज,चंचल पग दीप शिखा से,संध्या के बाद,वे आंखे, विजय,लहरों का गीत,यह धरती कितना देती है,में सबसे छोटी होऊँ, मछुए का गीत,चाँदनी, जीना अपने मे ही,बापू के प्रति,ग्राम श्री,जग के उर्वर आंगन में,काले बादल,तप रे,आज़ाद,द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र,गंगा, अमर स्पर्श,आओ हम अपना मन टोवे,परिवर्तन,जग जीवन मे जो चिर महान,पाषाण खण्ड,नौका व विहार,भारत माता,आत्मा का चिर धन,धरती का आंगन इठलाता,बाल प्रश्न,ताज,बांध दिए क्यों प्राण,चींटी,याद,वह बुड्ढ़ा, घण्टा, बापू,प्रथम रश्मि,दो लड़के,पर्वत प्रदेश में पावस, छोड़ द्रुमों की मृदु छाया,धेनुएँ, पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैतालीस, गीत विहंग। सुमित्रानंदन पंत नए युग के प्रवर्तक कहे जाते हैं। प्रकृति चित्रण करने वाले पंत आकर्षक व्यक्तित्व के धनी कहे जाते हैं। पंत अंग्रेजी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रहते थे। प्रकृति केंद्रित साहित्य की रचना करने वाले कवि थे। हिंदी साहित्य के विलियम वर्ड्सवर्थ कहे जाते थे। इन्होंने ही अमिताभ बच्चन को अमिताभ नाम दिया था।
  पंत को पद्मभूषण 1961 में, ज्ञानपीठ पुरस्कार 1968 में, सहित साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा अन्य कई पुरस्कार प्रदान किए गए। ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें “चिदम्बरा” काव्य कृति हेतु प्रदान किया गया था।
पंत की रचनाओं में समाज के यथार्थ के साथ ही प्रकृति चित्रण भी देखा जा सकता है। आधी सदी से भी अधिक लंबे रचनाकाल में पंत ने कई रचनाएँ लिखी।
 नेपोलियन से प्रभावित होकर इन्होंने अपने बाल भी उन्हीं की तरह रखे थे। बालपन में दादी की कहानियों ने इन्हें कवि बना दिया।
  पल्लव इनका तीसरा कविता संग्रह खूब लोकप्रिय हुआ जो 1928 में प्रकाशित हुआ।इनकी कविता अमर स्पर्श में लिखते है।
खिल उठा हृदय
पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय
खुल गए साधना के बंधन
संगीत बना उर का रोदन
अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण
सीमाएं अमिट हुई सब लय
क्यों रहे न जीवन में सुख दुख
क्यों जन्म मृत्यु से चित्त विमुख
तुम रहो दृगों के जो सम्ममुख
प्रिय हो मुझको भृम भय संशय
तन में आयें शैशव यौवन
मन में हो,विरह मिलन के व्रण
युग स्तिथियों से प्रेरित जीवन
उर रहे प्रीति में चिर तन्मय
जो नित्य अनित्य जगत का क्रम
व रहे न कुछ बदले हो कम
हो प्रगति हास का भी विभ्रं
जग से परिचय तुम से परिणय
तुम सुंदर से बन अतिसुन्दर
आओ अंतर में अंतरतर
तुम विजयी जो प्रिय हो मुझ पर
वरदान पराजय हो निश्चय
 पल्लव ऐसी ही कुल 32 कविताओं का बेहतरीन संकलन है ।उन्होंने अपने जीवनकाल में 28 कृतियाँ लिखी। विस्तृत वांग्मय उनका आज भी सुरक्षित है। पंत एक दार्शनिक,विचारक,मानवतावादी दृष्टिकोण के कवि साहित्यकार थे।इनका व्यक्तिगत संग्रहालय का नाम”सुमित्रानंदन पंत साहित्यिक वीथिका” के नाम से आज भी मौजूद है। ये प्रगतिशील लेखक संघ सर जुड़े रहे। इनके साथ रघुपति सहाय व शमशेर प्रमुख थे । सत्र 1955 से 1962 तक ये आकाशवाणी में मुख्य निर्माता के पद पर सेवारत रहे।
  वीणा पल्लव के छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य व पवित्रता से साक्षत्कार कराते हैं।1907 से1918 का इनकी साहित्य यात्रा का प्रथम चरण कहलाता हैं।
   पंत जी ने साहित्य यात्रा के तीन पड़ावों में छायावादी, समाजवादी, व प्रगतिवादी बन उत्कृष्ट एवम कालजयी रचनाओं का सृजन किया ।
 प्रकृति चित्रण करते ये लिखते हैं:-
 “जौ  गेंहूँ की स्वर्णिम बाली।
भू का अंचल वैभवशाली।।”
   इनके नाम से इलाहाबाद में एक उद्यान है जिसे सुमित्रानंदन उद्यान कहा जाता है।
  उनका मानना था कि स्वाध्याय से ही साहित्य और दर्शन का ज्ञानार्जन होता है।पंत के काव्य में प्रकृति का बहुत आत्मीय गहरा और व्यापक चित्रण मिलता है जो हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। ये कविता में शब्दों का चयन बखूबी करते थे।उनकी कविताओं में शब्द संगीत,चित्रात्मकता एवम व्यंजना प्रधान अर्थ देने की अद्भत क्षमता है।उन्हें “प्रकृति के सुकुमार कवि “कहा जाता है क्योंकि उनकी रचनाओं में कोमल कान्त पदावली है। उनकी स्वच्छन्दतावादी रुचि है।
   पंत जी ने खड़ी बोली को मिठास दिलाई।हिंदी को “युगवाणी” की संज्ञा दी। पंत जी की प्रगतिशील दौर की कविता वे आंखे में किसानों का दुख दर्द लिखा। उनकी कविता संध्या के बाद में उन्होंने गांवों के लोगों की विपन्नता,गरीबी के दृश्य का सुंदर शब्दों में वर्णन किया है। कविता ग्राम श्री में उन्होंने ग्राम्य प्रकृति पर आधारित कविता लिखी।गांवों की प्राकृतिक सुषमा और समृद्धि का मनोहारी वर्णन किया है।
  वे लिखते हैं-
“फैली खेतों में दूर तलक
मखमल की कोमल हरियाली,
लिपटी जिसमें रवि की किरणें
चाँदी की सी उजली जाली!
तिनकों के हरे – हरे तन पर
हिल हरित रुधिर है रहा झलक,
श्यामल भूतल पर झुका हुआ
नभ का चिर निर्मल नील फलक!
#राजेश कुमार शर्मा ‘पुरोहित’
परिचय: राजेश कुमार शर्मा ‘पुरोहित’ की जन्मतिथि-५ अगस्त १९७० तथा जन्म स्थान-ओसाव(जिला झालावाड़) है। आप राज्य राजस्थान के भवानीमंडी शहर में रहते हैं। हिन्दी में स्नातकोत्तर किया है और पेशे से शिक्षक(सूलिया)हैं। विधा-गद्य व पद्य दोनों ही है। प्रकाशन में काव्य संकलन आपके नाम है तो,करीब ५० से अधिक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा आपको सम्मानित किया जा चुका है। अन्य उपलब्धियों में नशा मुक्ति,जीवदया, पशु कल्याण पखवाड़ों का आयोजन, शाकाहार का प्रचार करने के साथ ही सैकड़ों लोगों को नशामुक्त किया है। आपकी कलम का उद्देश्य-देशसेवा,समाज सुधार तथा सरकारी योजनाओं का प्रचार करना है।
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।