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संवैधानिक मर्यादाएं,
तार-तार करते रहते है,
शर्मसार जो मानवता को,
बार-बार करते रहते हैं।
जिनके मन में न्याय व्यवस्था
का कोई सम्मान नहीं है,
जिनका कोई धर्म नहीं है
कोई भी ईमान नही है॥
मानव होकर भी जिनके मन
मानवता का वास नहीं है,
जिनको मानवता के दुख का
दर्दों का अहसास नहीं है।
उनको हिन्दू-मुस्लिम कहकर
धर्मों का अपमान करो मत।
मुनियों की पावन धरती का
दुष्कर्मों से मान हरो मत॥
हत्या जैसे घृणित कृत्य को,
उचित बताने वाले सुन लें
दुष्कर्मों से मानवता का,
शीष झुकाने वाले सुन लें।
पावन परम्पराओं को वे
हरगिज तोड़ नहीं पाएंगे,
मानवता के पथ से हमको
हरगिज़ मोड़ नहीं पाएंगे॥
#सतीश बंसल
परिचय : सतीश बंसल देहरादून (उत्तराखंड) से हैं। आपकी जन्म तिथि २ सितम्बर १९६८ है।प्रकाशित पुस्तकों में ‘गुनगुनाने लगीं खामोशियाँ (कविता संग्रह)’,’कवि नहीं हूँ मैं(क.सं.)’,’चलो गुनगुनाएं (गीत संग्रह)’ तथा ‘संस्कार के दीप( दोहा संग्रह)’आदि हैं। विभिन्न विधाओं में ७ पुस्तकें प्रकाशन प्रक्रिया में हैं। आपको साहित्य सागर सम्मान २०१६ सहारनपुर तथा रचनाकार सम्मान २०१५ आदि मिले हैं। देहरादून के पंडितवाडी में रहने वाले श्री बंसल की शिक्षा स्नातक है। निजी संस्थान में आप प्रबंधक के रुप में कार्यरत हैं।
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Fri Dec 22 , 2017
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