पर्वत की व्यथा

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namita dube
एक पर्वत खड़ा चुपचाप,
आप ही जलता मन में लेकर संताप
मैंने पूछा-क्यों हो तुम चिंतित निशब्द ?
लगता है जैसे बैठे हो कोसने अपना प्रारब्ध।
वह बोला उदास मन से-लगता है जैसे
मानव को अब नहीं है मेरी जरुरतI
वह जा पहुंचा है मंगल पर,
क्यों देखे अब मेरे घाव॥
सोचा था वरदान पाकर सेवा करूंगा जन-जन की,
क्या पता था परहित में,मैं ‘पर’ से ही लुटा जाऊंगा।
प्रकृति ही जीवन है,यह जान वह झल्लाया,
ईश्वर ने जो दिया,उसे उपहार पाकर बौराया।
मानव भस्मासुर बनकर सारी बातें भूल गया,
अपने आशियाने के लिए,मुझे ही उजाड़ दिया।
मेरी सुन्दरता को निहारते थे लाखों सैलानी,
अब यहाँ पड़े कचरे को देख दे गए मुझे वीरानी॥
हे मानव ! जान ज़रा तू मेरा मोल,
यूँ न उजाड़ यह तोहफा अनमोल
नहीं मिलेगी नदिया,लकड़ी,औषधि’ ऊर्जा,
न मिलेंगे पर्यटन के ख़ूबसूरत नज़ारे,और वर्षा
भले पहुचो तुम चाँद या मंगल,
और बना लो अनेक उपग्रह
जिस प्रकृति ने तुम्हें प्रगति दी है,
अब तो समझो तुम उसका मोल॥

                                                                        #नमिता दुबे

परिचय : नमिता दुबे  इंदौर की निवासी हैंl आप शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं और रचनाएं-लेख लिखने का काफी पुराना शौक रखती हैंl अभी करीब एक वर्ष से अधिक सक्रिय हैं,क्योंकि पात्र-पत्रिकाओं में इनका सतत प्रकाशन हो रहा है I 

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