शांतिनिकेतन यात्रा संस्मरण (भाग 2) छातिमतला

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शहरी कोलाहल से दूर शांतिनिकेतन के हरे भरे परिसर में आकर व्यक्ति का प्रकृति के साथ सीधा संवाद स्थापित हो जाता है…सांसारिक भाव कहीं लुप्त होने लगता है…प्रतिक्षण आसपास एक नैसर्गिक संगीत सुनाई देता है…विचारों के अंकुर भी यहां अनायास फूटने लगते हैं…

इस वातावरण में आकर मेरे मन में भी कई भाव उपजे…पेड़ों और फूलों की बातें…पंछियों का कलरव…हवाओं का संगीत… यह सब मुझे आगे भी बहुत कुछ लिखने के लिए प्रेरित करता रहेगा…

बहरहाल अभी बात छातिमतला की…

छातिमतला शांतिनिकेतन का एक प्रमुख अंग है। यह स्थल कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर के पिता महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर द्वारा कला और ध्यान साधना के लिए बनाया गया था। वे अक्सर यहां छातिम (सप्तपर्णी) वृक्ष के नीचे ध्यान किया करते थे।

सप्तपर्णी मूलतः संस्कृत शब्द है। बांग्ला भाषा में इसे छातिम कहते हैं। इसमें सात पत्तों के गुच्छे होते हैं और इन्हीं के बीच से फूल निकलते हैं। पत्तियां एक गोल समूह में सात सात के क्रम में सजी होती हैं और इसी कारण इसे सप्तपर्णी कहा जाता है। टैगोर ने ‘गीतांजलि’ के कुछ अंश सप्तपर्णी वृक्ष के नीचे ही लिखे थे। यहां विश्वभारती के दीक्षांत समारोह में ग्रेजुएट होने वाले हर छात्र को सप्तपर्णी वृक्ष की पत्तियां दी जाती हैं।

छातिम सदाबहार वृक्ष है। बारहों महीने हरा भरा रहने वाला। लेकिन शरद ऋतु में इसकी सुंदरता निखर कर सामने आती है। शायद ही ऐसा कोई फूल होगा जिसकी गंध इतनी मादक हो। सप्तपर्णी के साथ शरद ऋतु का संबंध भी एक पहेली जैसा है।

एक कवि का मन तो यह सोचता रहता है कि शरद के स्वागत के लिए सप्तपर्णी खिलती है या सप्तपर्णी के लिए ही शरद आता है… लेकिन यह वनस्पति विज्ञानियों के लिए शोध का विषय हो सकता है कि पूरे साल सामान्य सुगंध बिखेरनेवाला यह फूल शरद आते आते इतना मादक कैसे हो जाता है। इसके गंध में इतनी मादकता कैसे और कहाँ से समा जाती है…

इसे ‘यक्षिणी का वृक्ष’ भी कहते हैं। संभवतः इसके पीछे तर्क यह है कि सप्तपर्णी पहले अपनी सुंदरता से रिझाती है और फिर उसके करीब जाने पर अपनी मादकता से मदहोश कर देती है…

क्रमशः……..

#डॉ. स्वयंभू शलभ

परिचय : डॉ. स्वयंभू शलभ का निवास बिहार राज्य के रक्सौल शहर में हैl आपकी जन्मतिथि-२ नवम्बर १९६३ तथा जन्म स्थान-रक्सौल (बिहार)है l शिक्षा एमएससी(फिजिक्स) तथा पीएच-डी. है l कार्यक्षेत्र-प्राध्यापक (भौतिक विज्ञान) हैं l शहर-रक्सौल राज्य-बिहार है l सामाजिक क्षेत्र में भारत नेपाल के इस सीमा क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए कई मुद्दे सरकार के सामने रखे,जिन पर प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री कार्यालय सहित विभिन्न मंत्रालयों ने संज्ञान लिया,संबंधित विभागों ने आवश्यक कदम उठाए हैं। आपकी विधा-कविता,गीत,ग़ज़ल,कहानी,लेख और संस्मरण है। ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं l ‘प्राणों के साज पर’, ‘अंतर्बोध’, ‘श्रृंखला के खंड’ (कविता संग्रह) एवं ‘अनुभूति दंश’ (गजल संग्रह) प्रकाशित तथा ‘डॉ.हरिवंशराय बच्चन के 38 पत्र डॉ. शलभ के नाम’ (पत्र संग्रह) एवं ‘कोई एक आशियां’ (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन हैं l कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है l भूटान में अखिल भारतीय ब्याहुत महासभा के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विज्ञान और साहित्य की उपलब्धियों के लिए सम्मानित किए गए हैं। वार्षिक पत्रिका के प्रधान संपादक के रूप में उत्कृष्ट सेवा कार्य के लिए दिसम्बर में जगतगुरु वामाचार्य‘पीठाधीश पुरस्कार’ और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अखिल भारतीय वियाहुत कलवार महासभा द्वारा भी सम्मानित किए गए हैं तो नेपाल में दीर्घ सेवा पदक से भी सम्मानित हुए हैं l साहित्य के प्रभाव से सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-जीवन का अध्ययन है। यह जिंदगी के दर्द,कड़वाहट और विषमताओं को समझने के साथ प्रेम,सौंदर्य और संवेदना है वहां तक पहुंचने का एक जरिया है।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।