उम्मीद से हो क्या…

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कविता – उम्मीद से हो क्या

अक्सर होने वाली माँ के लिए कहा गया,
उम्मीद से हो क्या
क्या होता है उम्मीद से होना
उम्मीदें जिंदगी को बेहतरी से
जीने का हौसला देती हैं,
ये वो खुशी, वो अहसास है जो उसे
औरत से माँ बना देती है
किसी को बेशुमार प्यार करने
की चाहत देती है
वो नौ महीने का सफ़र
वो बीज से वृक्ष बनने तक की यात्रा में
ढेरों आँधी तूफान-सा कष्ट झेलना
कभी सूरज की पहली किरण-सी
बच्चे की पहली हलचल
वो बारिश की बूंदों सी नन्हीं हिचकियां
और वो अहसास जब आपके भीतर
एक नन्ही कोपल खिल रही हो
जिसकी जड़े आपके प्रेम का प्रतीक होती है
और जब उस वृक्ष पर फल पकेगा
दुनिया मे नन्हें कदम रखने को तैयार होगा
तब ढेरों पंछी आकर बैठेंगे टहनियों पर
साँझ का सूरज, झिलमिल तारे सब
स्वागत को आतुर होंगे
कोई दादा कोई नाना कोई बुआ
कोई घुट्टी ,कोई काजल, तो कोई खिलौने
सब अपने अपने हिस्से का प्यार लेकर आएंगे
आख़िर उम्मीदें होती है
आपके भीतर का प्रेम जगाने के लिए
एक नई पीढ़ी, एक नई सदी, एक नई सृष्टि के निर्माण के लिये

#आयुषी भण्डारी
कवियत्री एवं लेखिका
इन्दौर

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।