फ्रांस के बहाने मजहबी षड़यंत्र

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ये कौन लोग है ? जो फ्रांस में मजहबी नारा लगाकर एक शिक्षक का गला काटने वाले आतंकी के समर्थन में भारत मे बड़ी संख्या में फ्रांस का विरोध कर रहे है ? क्या यह कोई षड़यंत्र है, जो घटना किसी भी देश की हो, हिंसा व उग्र प्रदर्शन भारत में किए जाते है।

इस हेतु हमें इस विचारधारा को समझना होगा। सबसे पहले मुस्लिम देशों का नेतृत्व करने वाले कुछ लोगो के बयान समझने होंगे। यूँ तो तुर्की और पाकिस्तान मुस्लिमों को भड़काने में सबसे अग्रणी भूमिका में रहते है, पर इस बार मलेशिया भी इस दौड़ में सम्मिलित है। मलेशिया का पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद यह कहता है कि फ्रांस में हुए अत्याचारों के कारण मुसलमानों को फ्रांस के प्रत्येक नागरिक को मारने का हक मिल जाता है। अंतरराष्ट्रीय जगत में किसी देश के पूर्व नेतृत्व के द्वारा इतनी कट्टरता और क्रूरता वाली सोच विश्व को किस दिशा में ले जाएगी ? पाकिस्तान इमरान सरकार भी फ्रांस के विरोध में खड़ी है। क्या मजहबी नारा लगाकर किसी मानव की गर्दन काटने वाला व्यक्ति किसी शांति प्रिय मजहब के कहे जा सकते है ? बिल्कुल नही। जो लोग मजहब के नाम पर आम जनता का कत्ल कर रहे है, मुसलमानों के ह्रदय में उनके लिए सद्भावना क्यों है ? मुस्लिम देशों के नायक उन्हें इन्हें हत्याओं का हकदार क्यों बताते है ? क्या किसी देश में नरसंहार का हक किसी समुदाय को दिया जाना चाहिए ? यह जो वैचारिक आतंकवाद है, यह विश्व जगत के लिए बहुत खतरनाक है। आतंक को जब परिभाषित किया जाता है तो उसमें मजहब क्यों आड़े आ जाता है ? आज पूरा यूरोप इस इस्लामिक आतंकवाद के विरोध में खड़ा है, कई मुस्लिम देश इसे अपने विरुद्ध मान रहे है ऐसा क्यों ? जबकि आतंक या अत्याचार के विरुद्ध लड़ाई में किसी को कोई दिक्कत नही होना चाहिए।

प्रसिद्ध लेखक तारिक फतेह ने ज़ी न्यूज़ को दिए अपने वक्तव्य में बताया कि “भारत में हर दिन सुबह शाम मोमिन की फतेह के लिए और काफिरों को समाप्त करने की दुआ की जाती है, क्योंकि उनका उद्देश्य मूर्ति पूजक संस्कृति को समाप्त करना है। भारत मे एक षड्यंत्र के तहत ये घृणा के विचार चलाने का षडयंत्र चल रहा है, जिसमें उम्मा अर्थात कौम सबसे पहले मानी जाती है, ऐसे लोग केवल अपना झंडा ऊंचा रखने के लिए बाकि सभी सभ्यताओं को मिटा देना चाहते है।” (ज़ी न्यूज़ को दिए गए सख्सत्कार के आधार पर)

कोरोना संकट काल में भी भोपाल में कांग्रेसी नेता आरिफ मसूद हजारों मुस्लिमो को एकत्र करके भारत के मित्र देश फ्रांस के विरोध में उग्र आंदोलन करते है, भड़काऊ भाषण दिए जाते है, गला काटने वाली मानसिकता को पोषित किया जाता है, क्या यह सब सामान्य है ? क्या बंगलादेशी रोहिंगयाओं के नाम पर मुम्बई के आजाद मैदान की तरह भारत को जलने दिया जाएगा ? जहां अमर जवान ज्योति का भी अपमान हुआ। यह कोई पहली बार नही था। बल्कि हर बार विश्व के किसी न किसी विषय को लेकर मजहबी तंजीमो ने मुसलमानों को भड़का कर सड़क पर उतारने का काम किया। फिर भीड़ या तो हिंसक होकर जन सामान्य व शासकीय संपत्ति का नुकसान करती या और कोई उग्र कार्यवाही। बीते दिनों बैंगलोर की घटना भी हमें ध्यान रखना चाहिए जब एक टिप्पणी करने पर युवक के रिश्तेदार विधायक का घर जला दिया गया, परन्तु उस राजनीतिक दल के शीर्ष नेतृत्व ने चूं तक नही की। कुछ वर्ष पहले भी उत्तर प्रदेश के कमलेश तिवारी द्वारा कही गई टिप्पणी के बाद पूरे देश में आंदोलन व हिंसक घटनाएं होती है, ऐसा लगा जैसे देश में बहुत बड़े षड्यंत्र के रूप में इन उग्र आंदोलनों को नियोजित किया गया। इतना ही नही कुछ उग्रवादी युवकों द्वारा कमलेश तिवारी के घर में घुसकर उनका गला काटकर उनकी नृशंस हत्या कर दी जाती है। हम यहां किसी गलत टिप्पणी का समर्थन नही करते, परन्तु देश के किसी भी नागरिक को दण्ड देने के लिए न्यायपालिका है, पुलिस है, संविधान है। विरोध इस गला काटने वाली, कानून हाथ मे लेने वाली मानसिकता का है। क्या किसी व्यक्ति के विरोध में ये तत्व भारत के कई शहरों में हिंसा करेंगे ? यह आजादी इन्हें किसने दी ?

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन ने कट्टरवादी इस्लाम पर फ्रांस के सख्त रुख का विरोध करतर हर लोगो से फ्रांसीसी उत्पादों के विरोध करने की अपील की। तुर्की से प्रेरणा लेकर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी फ्रांस के समान का बहिष्कार करने का फतवा जारी किया। इन मजहबी लोगों के लिए सबसे ऊपर कौम होती है, हो सकता भारत का सामान्य समाज संविधान को सर्वोपरि मानता हो, न्यायपालिका को सर्वोपरि मानता हो, किन्तु इस देश में रहने वाले मजहबी लोग इन्हें सर्वोपरि न मानकर फतवो को सर्वोपरि मानते है। शार्ली एब्दो यूरोप के एक देश में कार्टून बनाता है उसके विरोध में भारत की सड़कों पर हिंसा की जाती है यह कहाँ तक सही है ? जबकि भारत में बहुसंख्यक समाज के देवी देवताओं के नग्न चित्र तक बना दिए गए परन्तु कोई हिंसा नही हुई।

आज फ्रांस सहित सभी यूरोपीय देश इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट हो रहे है, भारत ने भी फ्रांस का इस लड़ाई में पूर्ण समर्थन किया है, भारत के संप्रभुता व वैश्विक विचार के इस निर्णय के विपरीत भारत में भी फ्रांस के विरोध में कई जगह उग्र आंदोलन हुए। आतंकवाद को किसी कीमत पर बर्दाश्त नही किया जा सकता। फ्रांस की घटना को लेकर भारत में क्यों माहौल बिगाड़ने का प्रयास कर रही है मजहबी तंजीमें ? कठोर कानूनी कार्यवाही करते हुए हर उद्दंड उग्रवादी को सबक सिखाया जाए। देश की संप्रभुता से ऊपर कोई नही है। निश्चित रूप से लोकतंत्र देश की शक्ति है, परन्तु यह जिम्मेदारी है, उन्मादी और मजहबी मानसिकता से आक्रोशित भीड़ कभी लोकतंत्र का हिस्सा नही हो सकती, ऐसी हिंसक भीड़ का दमन जरूरी है।

मंगलेश सोनी
मनावर (मध्यप्रदेश)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।