गैर तो गैर,अपने भी अपने न हुए

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गैर तो गैर,अपने भी अपने न हुए,
जो जने थे अपने पेट से अपने न हुए।

क्या हाल सुनाऊं अपने दिल का,ये टूटा हुआ।
लिखा था जो मेरे भाग्य मे, वह भी फूटा हुआ।।
जो कभी सोचा था मैंने, वे पूरे सपने न हुए।
गैर तो गैर,अपने भी अपने न हुए।।

जिंदगी भी चार दिन की,कुछ तो गुजर गई।
बाकी जो कुछ बची है,वह भी बिखर गई।।
मिले जो दोस्त जिंदगी में,वे भी अपने न हुए
गैर तो गैर,अपने भी अपने न हुए।।

कितनी है मतलबी ये दुनिया,जब काम निकल जाएं।
पास नहीं फटकते है,वह दूर से नमस्ते कर जाए।।
दुनिया कमीनी हो गई,हम कमिने न हुए।
गैर तो गैर,अपने भी अपने न हुए।।

जो जैसा करेगा,वह वैसा ही भरेगा।
जो कुआं खोदेगा,वह उसमें ही गिरेगा।।
कुआं खोदते खोदते,जो उसमें ही दफन हुए।
गैर तो गैर ,अपने भी अपने न हुए।।

आर के रस्तोगी
गुरुग्राम

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।