`यस,आई एम फ्रॉम इन्डिया`

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rajnish dikshit

यही कोई दस साल पहले की बात है,जब मैं अफ्रीका में एक योजना पर काम कर रहा था। हमारा कैम्प शहर से काफी दूर था,जो जंगल और पहाड़ियों का मिश्रित इलाका था। दिन में तो फिर भी योजना में काम करने वाली कंपनियों की गाड़ियां और आते-जाते लोग दिख जाते थे,लेकिन शाम होते-होते सन्नाटा-सा पसर जाता था। हमारे कैम्प में कम्पनी द्वारा सारी सुविधाओं और सुरक्षा का समुचित प्रबंधकिया गया था।….वो दिसंबर की एक सर्द रात थी और लगभग रात के दस बजे थे। हम लोग(जिसमें अलग-अलग देश के लोग थे,हमारे पड़ोसी देश के लोग भी शामिल)खाना खाने के बाद,सामूहिक हॉल में बैठे गप-शप कर रहे थे। इलेक्ट्रिक हीटर से हॉल के अंदर खशनुमा माहौल था।….तभी अचानक जैसे कुछ गाड़ियों के कैम्प में आने की आवाज आई। अमूमन ऐसा होता था कि,कोई गाड़ी कैम्प में आने से पहले मुख्य द्वार पर रुकती थी और उपयुक्त सुरक्षा जांच के बाद ही उसे अंदर आने दिया जाता था। हम सबको लगा,जैसे गाड़ियां बिना किसी रोक-टोक के अंदर दाखिल हो गई हैं। हम सबको कुछ अंदेशा हुआ। हममें से कुछ अचानक खिड़की की ओर दौड़े तो देखा कि,शायद स्थानीय पुलिस के पेट्रोलिंग दस्ते की गाड़ियां है। इससे पहले कि,हम कुछ और सोच पाते,हॉल के दरवाजे पर `ओपन द डोर` की भारी-भरकम आवाज के साथ दस्तक हुई। मैंने अपने मित्रों की ओर देखते हुए दरवाजा खोल दिया। जैसे ही  दरवाजा खोला,पुलिस की वर्दी में एक हट्टे-कट्टे अधिकारी ने हाथ में बंदूक लिए प्रवेश किया। उसका अफ्रीकन डील-डौल,मोटी आवाज,हाथ में हथियार,….माहौल को गंभीर करने के लिए काफी था। जैसे ही वह अंदर आया,साथ ही सर्द हवा का झोंका भी आया,जो यह एहसास दिला गयाकि,बाहर कितनी सर्दी है।

हम सबको सहमा-सा देखकर,-`डोंट वरी,वी आर फ्रॉम अफ्रीकन पुलिस,जस्ट फ़ॉर चेकिंग`,उसने अपनी रौबीली आवाज में कहा। इस बीच हम सबने आभास कियाकि, उसके साथ आए बाकी के साथियों ने हमारे कैम्प को चारों ओर से घेर लिया था। उनकी संख्या कोई बारह से पंद्रह के बीच होगी। `यस, प्लीज सो योरआईडेंटिंटी कार्ड्स, हरी अप` कहते हुए उसने अपनी बंदूक ठीक की। `यस,यस,प्लीज वेट,वी आर ब्रिंगिंग अवर कार्ड्स` कहते हुए हम सब अपने-अपने कमरे की तरफ चल दिए। मैंने अपने कमरे में जाकर अपना कार्ड लिया और जैसे ही वापस आने को हुआ,मुझे याद आया कि,अभी शाम को ही मैंने फ्लास्क में पानी गर्म किया था। मैंने फ्लास्क देखा तो पानी अभी भी गर्म था। मैंने जल्दी से अलमारी खोली। मैं पिछले दिनों ही छुट्टियों से आया था। हम लोग जब भी छुट्टियों से वापस आते थे तो मिठाई या कुछ और खाने-पीने का सामान जरुर लाते थे। तो एक मिठाई काडिब्बा अभी भी बाकी था। मैंने पानी और मिठाई का डिब्बा लिया और हॉल में आ गया। तब तक कुछ लोग अपना पहचान-पत्र उसे दिखाने पहुँच चुके थे। मैं भी पहुँचा,अपना कार्ड दिखाया। उसके आश्वस्त होने के बाद, `प्लीज हैव वार्म वाटर एन्ड सम स्वीट। इट इज टू कोल्ड आउट साइड` मैंने निवेदन किया। सबसे पहले उसने मुझे ऊपर से नीचे की ओर देखा,जैसे कुछ समझने की  कोशिश कर रहा हो। `ओह,आई होप,यू आर इंडियन`, उसने प्रश्न किया। `यस,आई एम फ्रॉम इन्डिया,बट हाउ,डिड यू रिकग्नाइज?` मैंने पूछा। `येह,आई नो योर कल्चर। यू पीपुल ऑलवेज वेलकम विथ स्वीट्स। यू नेवर ऑफर वाटर विदाउट स्वीट`,उसने मुस्कुराते हुए कहा। तब तक मेरा एक और भारतीय मित्र अपने कमरे से एक और गर्म पानी का फ्लास्क और कुछ खाने का सामान ला चुका था। जब उसने सबके परिचय-पत्र जांच लिए और पूरी तरह आश्वस्त हो गया,मैंने उससे अनुरोध किया कि,वह अपने सभी साथियों को भी अंदर बुला ले,ताकि वे भी इस सर्दी में थोड़ी मिठाई और गर्म पानी ले सकें। उसने अपने सभी साथियों को अंदर बुलाया। बात-बात में उसने बतायाकि,उसके  पिता भी एक इंजीनियर थे और इन्डिया में एक `प्रोजेक्ट` के सिलसिले में कई साल काम किया। इन्डियन कल्चर के बारे में उसने उन्हीं से सुना।……..इसके बाद `शुक्रिया` कहते हुए वो लोग जा चुके थे। रात के लगभग बारह बज चुके थे। हम कुछ भारतीय मित्र अपनी परम्परा को सोच-सोचकर गर्व महसूस कर रहे थे,और खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। नींद जैसे कोसों दूर चली गई थी।

परिचय : रजनीश दीक्षित का जन्म 1975 में मई में कानपुर(उत्तर प्रदेश) में हुआ है l शिक्षा-एम.टेक.(मैके निकल इंजीनियरिंग) होकर पेशे से निजी कंपनी में महाप्रबंधक हैं l निवास गुजरात के वडोदरा(बड़ौदा) में है l आप लेखन कार्य निबंध,लघुकथा, कहानी,कविता, संस्मरण आदि विधाओं में करते हैं। आपको दयालबाग़ विश्वविद्यालय से निबंध लेखन में स्वर्ण पदक मिला है,जबकि आपकी रचनाएं विविध समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं l

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matruadmin

3 thoughts on “`यस,आई एम फ्रॉम इन्डिया`

  1. Rajneesh, I know you for the last 20 years and can say you are different not only technocrat but a BIG humane. Your writing skills have a touch and small poems gave messages.In out side India, you kept Indian culture at TOP and have won Hearts in India and abroad. Stay Blessed and spread the fragrance of love and humanity
    Arun Dixit

  2. Dear Sir,

    Sadar Charn Sparsh,

    Thank you very much for your time to read my writings. Your lovely comments really mean a lot for me. Your motivational words, blessings and love always give strength to do better and better.

    Thank you Sir,
    Best Regards,
    Rajnish

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।