अर्थ युग का चमत्कार

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rajkumar
जीने की कोशिश करता इंसान,
मगर कहाँ वह जी पाता..
पेड़ से गिरी सूखी पत्तियों को
पता है हमारा अतीतl
तब,
किसी की दबी-दबी सिसकियां
मद्धम-मद्धम-सी चीखें..
कानों में पड़ती थीं तो
दिल मोम की तरह पिघल जाता था,
और आत्मा की खुशबू
एक सपना बुनकर
ढँक देती थी
बहकी हुई फिजाओं कोl
लेकिन अब-
कानों ने यह सब सुनना छोड़ दिया है,
हृदय पत्थर-सा हो गया है..
दिलों ने खो दिए हैं इंसानियत के रंग
भस्मासुरों ने ले लिए हैं अवतार..
बेशर्म आंखें देखती हैं,
लूट,हत्या और बलात्कार
जिन-जिनको लगाया गले,
वो निकले आस्तीन का सांपl
रिश्तों को छलनी कर दिया है,
झूठ,कपट,बेशर्मी के शूलों ने..
कुछ अपनी,कुछ परायों की,
घुटती,दबती श्वासों को.
देखकर-सुनकर
उभरता एक ही शाश्वत प्रश्न..
क्या यही है अच्छे दिन का बोध
क्या यही है अर्थ युग का चमत्कार!
                                                                      #राजकुमार जैन ‘राजन’

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8 thoughts on “अर्थ युग का चमत्कार

  1. आदरणीय राजकुमार जैन राजन जी के कविता हृदय को स्पर्श कर गए । बहुत ही सही और सार्थक भावो के साथ शानदार रचना है ।सच है वर्तमान अर्थ का ही युग है । मानव मानवीयता छोड़कर अर्थ के पीछे दौर रहे है । कवि के मन में प्रश्न उठ रहे है कि यहीं है क्या अच्छे दिन ।

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    अर्थ युग का चमत्कारmatruadmin April 28, 2017 अर्थ युग का चमत्कार2017-04-28T09:11:00+00:00 No Comment

    जीने की कोशिश करता इंसान,
    मगर कहाँ वह जी पाता..
    पेड़ से गिरी सूखी पत्तियों को
    पता है हमारा अतीतl
    तब,
    किसी की दबी-दबी सिसकियां
    मद्धम-मद्धम-सी चीखें..
    कानों में पड़ती थीं तो
    दिल मोम की तरह पिघल जाता था,
    और आत्मा की खुशबू
    एक सपना बुनकर
    ढँक देती थी,,,,,,,,,,,,,गजब

  3. शुभकामनाएँ आपका स्नेह प्यार मिलता रहे

  4. माननीय राजकुमार जी ने बहुत ही सार्थक भाव के साथ ये काव्य रचना की है । मानव अर्थ के लिए दिन-रात एक कर देते है । उपार्जन बढ़े तो अच्छा दिन आएगा ये समझ लेते है ।मगर । अर्थ जब आ जाता है इन्सान इन्सानियत भूल जाते है । कवि मन में पश्न जाग उठी है कि यहीं है अर्थ युग का चमत्कार । सौ प्रतिशत सहीं विचार । शानदार रचना ।

  5. चिंतनशील विचारों की सुंदर शब्दों के साथ प्रस्तुति ।
    बहुत शुभकामनाएँ आदरणीय

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