रोचक और चिंतनशील कृति- साथ नहीं देती परछाई

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pradeep navin
“साथ नहीं देती परछाई” इंदौर के प्रसिद्ध आशुकवि प्रदीप नवीन का पहला ग़ज़ल संग्रह है। उनकी पूर्व में गीत, काव्य और व्यंग्य पर कृतियां प्रकाशित हो चुकी है। पाँच दशक से नवीन जी लेखन और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। लेकिन क्वालिटी से कभी समझौता नहीं करते हैं। यही वजह है की पाँच दशक के लेखन के बाद उन्होंने ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित करवाया है। नवीन जी इंदौर की अधिकांश साहित्यिक संस्थाओं में अपनी निस्वार्थ सेवा देते आ रहे हैं। उनकी रचनाएं भी लगभग देश की हर एक पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हुई है। और वर्तमान में भी हो रही है।

इस ग़ज़ल संग्रह में नवीन जी की 143 ग़ज़ल है। जो कि उनकी मूल विधा व्यंग्य के पुट के साथ समाज राजनीति, मानवीय मूल्यों के क्षरण पर कटाक्ष करने में नहीं चूकती है। भाषा सरल और सहज है। आम पाठक को समझ आने वाली है। इस संग्रह की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार हरेराम वाजपेयी “आश” ने बहुत ही सार गर्भित लिखी है।
संग्रह की ग़ज़लो पर चर्चा करें तो हम पाएंगे आज की मानवीय वृत्ति पर वे कहते है –

तलाश में किसी की भटकता है आदमी
हताश होकर खुद को झटकता है आदमी
******
ढूंढ कहाँ इंसान बचे है
गिन इतने शैतान बच्चे हैं।
******
कुछ शेर जो कि किसी विस्फोटक मिसाइल से कम नहीं कहे जा सकते हैं उनकी बानगी देखिए-

कुछ के चेहरे धूप कुछ के छाँव हो गये
फिर हमारे देश में चुनाव हो गए।
*******
आदमी को आदमी से प्यार चाहिए
कैसे भी मिले नगद उधार चाहिए
*******
हम ने रगड़ी एड़ियां तब तो कुछ नहीं
पा लिया जो कुछ तो हाथ मल रहे हैं लोग
*******
कंपकपाती ठंड से कल एक भारत मर गया
जीते जी किसने ओढाया एक दुशाला झूठ का
*******
ढूंढने से भी मुझे मिला नहीं
शब्दकोश में जो शब्द प्रीत है
*******
वर्षा ने मुँह फेर लिया
चिंताओं ने घेर लिया
बर्तन में बाजारों से
पानी दस का सेर लिया
*******
मत उठा तू ऊँगलिया किसी भी दिशा में
हर तरफ बजता हुआ बस ढोल पाएगा
*******
सबसे अच्छी यही हवा
सिर्फ हवा में लठ्ठ चला
देख लाठी सब टल जाती
सर पर आती एक बला
********
उत्साह से भरी शेरों की श्रृंखला में कुछ बहुत ही उम्दा शेर नवीन जी ने कहे हैं। जैसे –

दो कदम भी तो मुझसे न जाता चला
कल्पना में बहुत घूम लेता हूं मैं।
********
आंसुओं से हमारा रिश्ता था
आप आए तो मुस्कुराए है।
*******
चलो एक अभियान चलाएं
अच्छे कुछ इंसान बनाएं
बटे नहीं जाती टुकड़ों में
अच्छा हिंदुस्तान बनाएं

और भी बहुत से उम्दा शेर है जो इस कृति को रोचक और चिंतनशील कृति का प्रमाण पत्र देते हैं। जो हर एक पाठक को झकझोरते हैं, खुद से प्रश्न करने का मजबूर करते हैं।
प्रदीप नवीन जी व्यावहारिक रूप से भी अपने मित्रों के बीच आरामी और फक्कड़ अंदाज के लिए जाने जाते हैं। और यही कारण है कि वह देर से अपना ग़ज़ल संग्रह लाए पर दुरुस्त लाए। बरहाल इस उम्दा संग्रह के लिए उनको बधाई।

कृति- साथ नहीं देती परछाई

रचनाकार- प्रदीप नवीन

प्रकाशक-हिंदी परिवार , इंदौर

पृष्ठ-165

मूल्य-200/-

समीक्षक– संदीप सृजन

 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।