खुद को मिटाकर कभी हम भी देखेंगे

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alok koushik
किसी की मोहब्बत में खुद को मिटाकर कभी हम भी देखेंगे
अपना आशियां अपने हाथों से जलाकर कभी हम भी देखेंगे
ना रांझा ना मजनूं ना महिवाल बनेंगे इश्क में किसी के
महबूब बिन होती है ज़िंदगी कैसी कभी हम भी देखेंगे
मधुशाला में करेंगे इबादत ज़ाम पियेंगे मस्ज़िद में
क्या सच में हो जायेगा ख़ुदा नाराज़ कभी हम भी देखेंगे
प्रेम तो पर्याय होता है अनिश्चितकालीन प्रतीक्षा का
बनकर अपनी उर्मिला का लक्ष्मण कभी हम भी देखेंगे
कहते हो ख़ुदा की कोई जाति नहीं होती अच्छा मज़ाक है
ऐसा ही एक मज़ाक तेरे साथ करके कभी हम भी देखेंगे
#आलोक कौशिक
                  परिचय:- 
                 नाम- आलोक कौशिक
                 पेशा- अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन
                 पता- कस्तूरी वाटिका, जिला- बेगूसराय, राज्य- बिहार,  
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।