तेजी से काम करता है आयुर्वेद..

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gupta
मित्रों नमस्कार,
हमेशा से ही मेरी कोशिश रही है कि, आयुर्वेद के मूलभूत को जन-जन तक पहुँचाऊँ और आयुर्वेद के इस प्रभाव को जनमानस से दूर करुं,जिस कारण वह आयुर्वेद को १०-२० जड़ी-बूटी वाली चिकित्सा पद्धति समझते हैं। इसी कारण से मैं कभी ऐसे अनर्गल योग नहीँ लिखता,जिनमें व्यक्ति को स्वयं बनाकर प्रयोग करने की हिदायत दी जाती हो और नीचे लिखा जाता हो कि ‘न बना पाएं तो हमसे मंगवा लें’,सही मायने में ऐसे लेखों का क्या आशय होता है,बहुत ही कम लोग समझ पाते हैं। वे सभी ध्यान से पढ़ लें इस लेख को,जो कहते हैं कि,आयुर्वेद धीरे-धीरे काम करता है। जहाँ एलॉपैथी में खाने की दवाएं व इंजेक्शन नाकारगर होने के बाद प्लेटलेट ट्रांसफ्यूज़न की तैयारी थी,वहीँ आयुर्वेद की मात्र पहली ३ खुराक ने कमाल दिखाना शुरु कर दिया।
यह चिकित्सा अनुभव उस रोगी पर आधारित है जिसकी रक्त चक्रिका (प्लेटलेट)संख्या बेतहाशा घट जाने के बाद प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन (प्लेटलेट चढ़ाना)की व्यवस्था समय पर न होने के कारण,इनका रिश्तेदार (आयुर्वेद समर्थक) रोगी को मेरे पास लेकर आया।
यह रोगी अचानक बेहोश हो गया था। बुखारी मौसम का वहम व लक्षण होने के कारण जब इनका एमपी टेस्ट कराया तो वह पॉजिटिव पाया गया। शरीर में प्लेटलेट काउंट मात्र चालीस हज़ार पाई (सामान्य हालत में कम-से-कम डेढ़-दो लाख होने चाहिए)गई।
मैंने अपने अनुभवानुसार एक दिन में तीन खुराक के हिसाब से उसे चिकित्सा व्यवस्था दी। पहली तीन खुराक पूरी होने पर पुनः परीक्षण कराने पर प्लेटलेट 60 हज़ार पर आ गई तथा तीन दिन की नौ खुराक पूरी होने पर प्लेटलेट डेढ़ लाख पर आ गई। इस प्रकार शरीर में चौथे ही दिन से पूर्ववत्त बल आ गया व दलिया, पतली खिचड़ी,चीकू,मुनक्का आदि के आहार पर इसे रखा गया। यहाँ ध्यान रखने योग्य दो बातें हैं-पहली यह कि जहाँ ऐसे मामलों में एलॉपैथी चिकित्सा फ्रूटी आदि पिलाकर प्लेटलेट बढ़ाने की पैरवी करती आई है,वहीं दूसरी और ऐसे ज्वर में आयुर्वेदिक चिकित्सा में फलों का रस हानिकारक मानकर ऐसे रोगी को फलों के रस से परहेज कराता रहा।
दूसरा सबसे मुख्य बिंदु कि ऐसे रोगों में जहाँ पाँच सितारा होटल नुमा अस्पतालों की चकाचौंध से आकर्षित होकर जब रोगी का तीमारदार रोज १०-२० हज़ार खर्चने को तैयार हो जाता है,वहीं रोज कुछ सौ-दो सौ रुपए का खर्च आने पर आयुर्वेदिक चिकित्सक को ‘आयुर्वेदिक दवाएं भी इतनी महँगी होती हैं क्या’ सुनने को मिलता है।

                                                                  #डॉ. निशान्त गुप्ता आयुष

परिचय : शामली (उत्तरप्रदेश) के गाँधी चौक में चिकित्सा क्षेत्र में सेवारत डॉ. निशान्त गुप्ता आयुष, दर्द,गुर्दा-मूत्र रोग विशेषज्ञ हैं और इस क्षेत्र में फैली भ्रांतियों कॊ दूर करने में प्रयासरत हैं। इस के लिए जागरूकता सम्बन्धी आपके कई लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।