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एक नारी को बेटी, बहन, पत्नी और माँ के रूप में सृष्टि का अद्भुत वरदान प्राप्त है। इस देश में मातृशक्ति के रूप में नारी की पूजा की जाती है। जिस मिट्टी में हमने जन्म लिया वह भारत माता कहलाती है। माता पिता के समस्त संचित पुण्यकर्मों के फल के रूप में घर में बेटी का जन्म होता है….

कुछ ऐसी ही मान्यताओं के बीच हम पले बढ़े हैं लेकिन क्या सच में हम सब उन्हें वह मान, वह अवसर, वह वातावरण दे पाये जिसकी वो हकदार हैं…

आज के बदलते दौर में जहां पुरुष और नारी के बीच समानता और बराबरी को लेकर तमाम बहस किये जाते हैं। बड़े बड़े मंच से नारी सशक्तिकरण की वकालत की जाती है। देश भर में बालिकाओं की शिक्षा को लेकर सरकार की विभिन्न योजनाएं भी चल रही हैं लेकिन यह असमानता भी अपनी जगह बदस्तूर कायम है। हर बार जब किसी क्षेत्र में कोई लड़की कामयाबी हासिल करती है तो जोरशोर से उसका प्रचार होता है उसकी मिसाल दी जाने लगती है और नए सिरे से नारी सशक्तिकरण की चर्चा शुरू हो जाती है।

उस खास लड़की की सराहना में तारीफों के पुल बांधते समय हमें अपने आसपास भी नजर डालना चाहिए और सोचना चाहिए कि सामाजिक परिवेश के खिलाफ अपने आत्मविश्वास और जिद के बदौलत कितनी लड़कियां अपनी पहचान बना पाती हैं।
लड़कियों की उच्च शिक्षा को लेकर चिंता किया जाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा को गैरजरूरी समझता है।
देश के अनेक ग्रामीण अविकसित और आदिवासी इलाकों में आज भी लड़कियां चूल्हे चौके और बच्चे पालने के अलावा कुछ नहीं जानतीं। बाल विवाह आज भी बदस्तूर जारी है।

देश में बहुत कुछ बदला लेकिन लड़कियों को पूर्ण सुरक्षा का वातावरण नहीं मिल सका।
जब तक देश के किसी भी कोने में किसी भी बेटी के सामने भय का यह साया बना रहेगा तब तक हम एक सभ्य समाज में जीने का दावा नहीं कर सकते।

हमारी बहन बेटियां सुरक्षित वातावरण में जी सकें,  खुली हवा में सांस ले सकें, देश और समाज के विकास में खुलकर भागीदारी कर सकें इसके लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगी। हर गांव, हर शहर की बेटी को पूरी शिक्षा मिले, हर बेटी सक्षम और आत्मनिर्भर बने तभी एक समृद्ध परिवार और समृद्ध समाज का सपना साकार होगा।

मेरा मानना है…नारों और भाषणों से बदलाव नहीं होता। बदलाव के लिए जमीन पर ईमानदार पहल की आवश्यकता होती है। हम आप इस दिशा में आगे आएं…कड़ी से कड़ी जुड़ती जायेगी… कारवाँ बनता जायेगा…और तभी वास्तव में बेटियों को वह स्थान मिलेगा जिसकी वो हकदार हैं…

ईश्वर ने नारी में पुरुषों की अपेक्षा कई गुना अधिक आत्मबल दिया है। आज केवल जरूरत है उनका हौसला बढ़ाने की, उनकी उड़ान को नया आकाश देने की…

#डॉ. स्वयंभू शलभ

परिचय : डॉ. स्वयंभू शलभ का निवास बिहार राज्य के रक्सौल शहर में हैl आपकी जन्मतिथि-२ नवम्बर १९६३ तथा जन्म स्थान-रक्सौल (बिहार)है l शिक्षा एमएससी(फिजिक्स) तथा पीएच-डी. है l कार्यक्षेत्र-प्राध्यापक (भौतिक विज्ञान) हैं l शहर-रक्सौल राज्य-बिहार है l सामाजिक क्षेत्र में भारत नेपाल के इस सीमा क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए कई मुद्दे सरकार के सामने रखे,जिन पर प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री कार्यालय सहित विभिन्न मंत्रालयों ने संज्ञान लिया,संबंधित विभागों ने आवश्यक कदम उठाए हैं। आपकी विधा-कविता,गीत,ग़ज़ल,कहानी,लेख और संस्मरण है। ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं l ‘प्राणों के साज पर’, ‘अंतर्बोध’, ‘श्रृंखला के खंड’ (कविता संग्रह) एवं ‘अनुभूति दंश’ (गजल संग्रह) प्रकाशित तथा ‘डॉ.हरिवंशराय बच्चन के 38 पत्र डॉ. शलभ के नाम’ (पत्र संग्रह) एवं ‘कोई एक आशियां’ (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन हैं l कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है l भूटान में अखिल भारतीय ब्याहुत महासभा के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विज्ञान और साहित्य की उपलब्धियों के लिए सम्मानित किए गए हैं। वार्षिक पत्रिका के प्रधान संपादक के रूप में उत्कृष्ट सेवा कार्य के लिए दिसम्बर में जगतगुरु वामाचार्य‘पीठाधीश पुरस्कार’ और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अखिल भारतीय वियाहुत कलवार महासभा द्वारा भी सम्मानित किए गए हैं तो नेपाल में दीर्घ सेवा पदक से भी सम्मानित हुए हैं l साहित्य के प्रभाव से सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-जीवन का अध्ययन है। यह जिंदगी के दर्द,कड़वाहट और विषमताओं को समझने के साथ प्रेम,सौंदर्य और संवेदना है वहां तक पहुंचने का एक जरिया है।

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