अबू धाबी का ऐतिहासिक फैसला, अदालत की तीसरी अधिकारिक भाषा बनी हिंदी

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archana dube

अबूधाबी ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अरबी और अंग्रेजी के बाद हिंदी को अपनी अदालत में तीसरी अधिकारिक भाषा के रूप में शामिल कर लिया है । न्याय तक पहुँच बढाने के लिहाज से यह कदम उठाया गया है । अबूधाबी न्याय विभाग (एडीजेडी) ने शनिवार को कहा कि उसने श्रम मामलों में अरबी और अंग्रेजीके साथ हिंदी भाषा को शामिल करके अदालतों के समक्ष दावों के बयान के लिए भाषा के माध्यम का विस्तार कर दिया है ।

अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, संयुक्त अरब अमीरात की आबादी दो तिहाई हिस्सा विदेशों के प्रवासी लोग है । संयुक्त अरब अमीरातमें भारतीय लोगों की संख्या 26 लाख है जो देश की कुल आबादी का 30 फीसदी है और यह देश का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है । एडीजेडी के अवर सचिव युसूफ सईद अल अब्री ने कहा कि दावा शीट, शिकायतों और अनुरोधों के लिए बहु भाषा लागू करने का मकसद प्लान 2021 की तर्ज पर न्यायिक सेवाओं बढ़ावा देना और मुकदमें की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना है ।

अबूधाबी न्याय विभाग ने दिनांक 09/02/ 2019 को कहा कि उसने श्रम मामलों में अरबी और अंग्रेजी के साथ हिंदी भाषा को शामिल करके अदालतों के समक्ष दावों के बयान के लिए भाषा के माध्यम का विस्तार कर दिया है । कई भाषाओं में याचिकाओं, आरोपों और अपीलों को स्वीकार करने के पीछे हमारा मकसद भविष्य की योजना को देखते हुए सभी के लिए न्याय व्यवस्था को प्रसारित करना है ।

इसी कड़ी में हिंदी भाषियों को अबूधाबी न्यायिक विभाग की अधिकारिक वेब साइड के जरिये रजिस्ट्रेशन की सुविधा भी उपलब्ध करायी जा रही है । यूएड  में द्वीभाषी कानूनी व्यवस्था का पहला चरण नवम्बर, 2018 में लांच किया गया था । इसके तहत सिविल और वाणिज्यिक मामलों में यदि वादी प्रवासी हो, तो अभियोगी केश के दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद करना होता है । इस आदेश के बाद यह सुविधा अब हिंदी में भी उपलब्ध होगी ।

 

आपको बता दे कि प्रतिवर्ष विश्व भर में 14 सितम्बर को ‘हिंदी दिवस’ मनाया जा रहा है । हिंदी भाषा की बात ही निराली है इसे ना सिर्फ जानने वाले पसंद करते है बल्कि विदेशी इस भाषा से खासा लगाव रखते है । हिंदी भाषा को ऐसी कड़ी माना जाता है जो भारत को किसी भी देश के साथ आसानी से जोड़ने का काम करती है । यह हिंदी भाषा की मिठास ही है कि इसे देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी चाहने वालों की कमी नहीं है । गौरतलब है कि 14 सितम्बर, 1949 को हिंदी को राजभाषा दर्जा मिला था उसी समय से हर साल यह दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

भारत के साथ ही सूरीनाम, फिजी, त्रिनीडाड, गुयाना, मॉरिशस, थाइलैंड व सिंगापुर में भी हिंदी वहा की राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है और अब अबूधाबी को मिलाकर हिंदी भारत के अतिरिक्त आठ देशों की मान्यता प्राप्त भाषा बन गयी है । इसी के साथ विश्व के 44 ऐसे राष्ट्र है जहां की 10% या उससे अधिक जनता हिंदी बोलते और समझते है । इसीलिए एक बड़ी आबादी के न्याय, समानता का मान रखते हुए आबूधाबी की सरकार ने अपने न्यायालयों में जब हिंदी को अधिकृत भाषा का दर्जा दिया तो यह हमारे देश के साथ ही भाषाई गर्व का भी प्रतीक के रूप में उपस्थित हो गया,पर हम सब कब इस बात को समझेंगें । साथ ही विदेशी धरती पर हिंदी का यह महत्व अपनेदेश की न्याय व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह भी खड़ा करता है । जहा आजादी के 70 साल के बाद भी न्याय के मंदिर में हिंदी व भारतीय भाषाओं को दोयम दर्जा प्राप्त है । यह भारतीयों के लिए बहुत शर्म की बात है कि आज भी न्याय की भाषा एक औपनिवेशिक संस्कृतिकी प्रतीक भाषा अंग्रेजी है । जहां अंग्रेजी के मूल दस्तावेज को ही प्रमाण माना जाता है वहां लोकतंत्र की मूल परिभाषा का ही हँसी उड़ाया जा रहा है ।

अब लगता है कि वह समय आ गया है कि हम भारतीय गुलाम मानसिकता को दूर कर अपनी भाषा को वह सम्मान दिलाए जिसकी वह अधिकारिणी है । न्याय व्यवस्था में भारतीय भाषाओं की मांग को मजबूती के साथ रखा जाय ।

एक मुस्लिम देश में हिंदी को लेकर हुआ ऐतिहासिक फैसला, वहां की अदालतों में इसे अब माना जायेगा तीसरी ऑफिशियल भाषा । देश के अफसरों ने बताया कि हिंदी को मिला सम्मान ।

परिचय-

नाम  -डॉ. अर्चना दुबे

मुम्बई(महाराष्ट्र)

जन्म स्थान  –   जिला- जौनपुर (उत्तर प्रदेश)

शिक्षा –  एम.ए., पीएच-डी.

कार्यक्षेत्र  –  स्वच्छंद  लेखनकार्य

लेखन विधा  –  गीत, गज़ल, लेख, कहाँनी, लघुकथा, कविता, समीक्षा आदि विधा पर ।

कोई प्रकाशन  संग्रह / किताब  –  दो साझा काव्य संग्रह ।

रचना प्रकाशन  –  मेट्रो दिनांक हिंदी साप्ताहिक अखबार (मुम्बई ) से  मार्च 2018 से ( सह सम्पादक ) का कार्य ।

  • काव्य स्पंदन पत्रिका साप्ताहिक (दिल्ली) प्रति सप्ताह कविता, गज़ल प्रकाशित ।

  • कई हिंदी अखबार और पत्रिकाओं में लेख, कहाँनी, कविता, गज़ल, लघुकथा, समीक्षा प्रकाशित ।

  • दर्जनों से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रपत्र वाचन ।

  • अंर्तराष्ट्रीय पत्रिका में 4 लेख प्रकाशित ।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।