सहोदरी कहानी – २ : समीक्षा

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पुस्तक  : सहोदरी कहानी-२
संपादक : श्री जयकान्त मिश्रा
प्रकाशन : भाषा सहोदरी हिन्दी
मूल्य  :  ₹ ४००
भारतभूमि विभिन्न भाषाओं व संस्कृतियों के गौरवपूर्ण सह- अस्तित्व के लिए जानी जाती है। भाषा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा कोई भी समाज अपनी संस्कृति और अस्मिता को सुरक्षित रख पाता है। हमारी मातृभाषा हमारी पहचान होती है।मातृभाषा के द्वारा हम अपनी बातों, संस्कृति व सभ्यता को दूसरों के समक्ष सहजता और सुन्दरता के साथ पूर्णरूपेण प्रस्तुत कर सकते हैं। हमारी मातृभाषा हिन्दी ऐसी ही सर्वगुणसम्पन्न भाषा है। परन्तु खेद है कि आज़ादी के ७० वर्षों के पश्चात भी इसे वह समादृत स्थान नहीं मिला जिसकी वस्तुतः हिन्दी भाषा अधिकारिणी है ।
           अतः हिन्दी को देश में  समादृत स्थान दिलाने की दिशा में “भाषा सहोदरी हिन्दी ” भारत का ऐसा संगठन है जो दीर्घकाल से हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार और विकास हेतु कार्यरत है।इसके विभिन्न प्रचार- प्रसार के माध्यमों में एक है ; हिन्दी कवियों ,लेखकों और साहित्यकारों को सशक्त मंच प्रदान करना। इसका पूरा श्रेय भाषा सहोदरी हिन्दी के मुख्य संयोजक श्री जयकान्त मिश्रा जी को जाता है जिन्होंने भाषा सहोदरी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों और विभिन्न साझा संकलनों के माध्यम से हिन्दी साहित्य की विविध  विधाओं को उत्कृष्ट मंच प्रदान किया है।
           हिन्दी की विविध विधाओं का संकलन व समीक्षा समय -समय पर प्रस्तुत करते हैं जैसे  -सहोदरी लघुकथा, सहोदरी कथा , भाषा सहोदरी हिन्दी , सहोदरी सोपान आदि । इन्हीं साझा संकलनों में ‘सहोदरी कहानी – २’ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसका विमोचन दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कालेज के प्रांगण में २४व२५ अक्टूबर २०१८ के भाषा सहोदरी के छठेंं अन्तर्राष्ट्रीय अधिवेशन में सम्पन्न
 हुआ ।
                     ‘ सहोदरी कहानी -२’ बेहतरीन  और चुनिंदा कहानियों का साझा संग्रह है। प्रस्तुत संग्रह में देश के विभिन्न प्रदेशों से चयनित कहानीकारों की सर्वोत्कृष्ट कहानियाँ चयनित की गयी हैं।  इसमें इकतालीस कथा लेखकों की छोटी बड़ी सत्तावन कहानियों को स्थान दिया गया है । सभी कहानियाँ एक से बढ़कर एक हैं । इनमें से किसी को कम  या ज्यादा अच्छा कहना दूसरी कहानियों के साथ अन्याय ही होगा । फिर भी कुछ कथानक ऐसे हैं जो आपको अपने कथा के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों के विषय में सोचने पर विवश कर देते हैं । कुछ कहानियाँ सामाजिक समस्याओं के समाधान देने में सफल भी रही हैं  ।
                 इसमें अनु पाण्डेय जी की “रैन बसेरा”, श्री अहमद निसार जी की ” खामोश समंदर “, अरुण गुप्ता जी की ” तोशी की माँ “, डॉ. उपासना पाण्डेय की “संतुष्टि”, इन्दिरा पूनावाला की” रिश्ते “, ऋचा वर्मा की ” बिल्कुल अकेली”, श्री घनश्याम ठाकुर जी की “कर्मठ दिव्यांग” आदि उल्लेखनीय हैं।
               मीना सिंह सोलंकी जी का “नेह बन्धन”, प्रभात दूबे जी की “जल्लाद”,  पूनम आनन्द जी की ” दबी रह गयी पहचान ” व मनीषा जोबन जी की” कुछ टूटा है दिल में “,  कहानियाँ सम्बन्धों व भावनाओं के ताने -बाने को बडी़ सहजता से उकेरती हैं।
              डॉ० नीना छब्बर की कहानी ” विशेषी कौमारी ”  किन्नर सन्तान के मनोभावों व समस्याओं को दर्शाते हुए उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की बात हृदय को छू जाती है। श्री हरिप्रकाश राठी जी की “अमरूद का पेड़” और सुरेश बाबू जी की ” थरथराती लौ” समाज में बढ़ती हुई संवेदनहीनता की ओर इंगित करती है ।
                      वस्तुतः सहोदरी  की प्रत्येक कहानी आपको पृथक्-पृथक् विषय संसार में आकृष्ट करने में समर्थ हैं। पुस्तक  को एक बार पलटने पर बिना पूरा पढ़े आप इसे रख नहीं पाएँगे। विषयों  व कहानियों को विषय की क्रमबद्धता में रखने में सम्पादक श्री जयकान्त मिश्र जी सफल रहे हैं  उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है ।
              भाषा व विषय के प्रवाह में किंचित टंकण अशुद्धियाँ  यत्र-तत्र अवरोध उत्पन्न करती हैं। परन्तु कथा के उन्माद में पाठक का ध्यान आकृष्ट करने में नगण्य है।
        पुनः श्री जयकान्त जी को उत्तम कहानी- संग्रह “सहोदरी कहानी-२” हेतु हार्दिक बधाई देती हूँ। आशा करती हूँ कि ऐसे ही उत्कृष्ट साझा संग्रहों के माध्यम से वह हिन्दी साहित्य की सेवा करते हुए हिन्दी का प्रचार-प्रसार सफलतापूर्वक करते रहेंगे।हिन्दी के नवोदित साहित्यकारों को सशक्त मंच प्रदान करते रहेंगे। निश्चय ही, उनके साथ हिन्दी के इस अभियान यज्ञ में अन्य साहित्यप्रेमी, स्वयंसेवी संस्थाएँ, पत्रकार और राजनेता भी अपने सहयोग समिधा से योगदान देने के लिए आगे आएँगे।
                     #डॉ. उपासना पाण्डेय
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।