माचिस

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priti kambale

बहुत वक़्त गुज़रा है, वक़्त को तराशते हुए।

घुप्प अँधेरे में माचिस, तलाशते हुए।।

अब नहीं है वक़्त कि, ख़ुद को शो-पीस बना लें।

अब सही वक़्त है कि ख़ुद को माचिस बना लें।।

ताकि जल सकें मोमबत्तियाँ,जल सकें मशालें।

ताकि लौट जे आ सकें ,फिर से उजालें।।

बहुत ज़रूरी है कि ख़ुद, को माचिस बना लें।।
जब तलक आयेगा न कोई ख़ुद को जलाने वाला।

ये अँधेरा संशय का यूँ ही नहीं जाने वाला।

उजालों को अग़र फिर से लाना होगा तो कहीं न कहीं से ख़ुद को जलाना होगा।

अपने अंदर दबे हुए बारूद को खंगालें।

बहुत ज़रूरी है कि ख़ुद को माचिस बना लें।।
इससे पहले कि कोई ज़िन्दगी के कोरे पृष्ठों को काले कर दे।

इससे पहले कि कोई दिल,जिगर,ज़ेहन और रूह में छाले कर दे।

इससे पहले कि कोई ख़त्म उजाले कर दे।

इससे पहले कि कोई हमें अपनी हवस के हवाले कर दे।

आओ, उठे और उठकर ऐसे हालात को संभालें।

बहुत ज़रूरी है कि ख़ुद को माचिस बना लें।।
इससे पहले कि कोई मासूम-सा ख़्वाब बेवक़्त टूट जाये।

इससे पहले कि कोई बचपन या यौवन लूट जाये।।

इससे पहले कि कोई दर्द उठे कोई चीख़ उठ जाये।

इससे पहले कि कोई दम बेदम होके छूट जाये।

आओ इस भीड़ को चीर कर कोई रास्ता निकालें।

बहुत ज़रूरी है कि ख़ुद को माचिस बना लें।।
इससे पहले कि कोई,आँखों के लिए ग़म का पानी लिखे।

इससे पहले कि कोई आंसुओं से कहानी लिखे।

इससे पहले कि कोई ज़हनों में हैरानी लिखे।

इससे पहले कि कोई लुट गई जवानी लिखे।

आओ, अपनी अज़्म को अपनी ताक़त मज़बूत बना लें।

बहुत ज़रूरी है कि ख़ुद को माचिस बना लें।।

 

परिचय : 
नाम—श्रीमती प्रीति कांबले “”बरखा”

बालाघाट (मध्यप्रदेश)
सम्प्रति——1.प्रतिनिधि,”साहित्य कलश”साहित्यिक पत्रिका” पटियाला(पंजाब) 2.उपाध्यक्ष,”सहमत” साहित्यिक व सामाजिक संस्था बालाघाट (म प्र)
प्रकाशन—अनेक संकलनों एवं पत्र पत्रिकाओं में
प्रसारण—आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से
प्रस्तुति—-“बहुत ख़ूब” धमाल ,दबंग चैनल,
कवि समेलनों में काव्य पाठ एवं संचालन
सम्मान—महाकवि शेक्सपियर अंतर्राष्ट्रीय सम्मान,कवियत्री महादेवी वर्मा सम्मान,मातोश्री रमाबाई भीमराव आंबेडकर फेलोशिप अवार्ड,बीसवीं शताब्दी रत्न सम्मान,आधुनिक सुभद्रा कुमारी चौहान ,कटनी रत्न 2008,क्रांति ज्योति सावित्री बाई फुले सम्मान,डॉ लक्ष्मीनारायण दुबे स्मृति सम्मान सहित अनेक सम्मानोपाधियों से अलंकृत….!!!
विधा—-कविता,ग़ज़ल,नज़्म, मुक्तक़,लघुकथा…!!!
प्रकाशनाधिन—मुक्तक़ संग्रह,लघुकथा संग्रह…

 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।