एक गजल

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punam gujrani
कभी चांदी कभी सोना कभी मोती दिखाती है
ये दुनिया है हमारी मुफलिसी को आजमाती है।
कभी पीली, कभी नीली, कभी काली हुई औरत
मगर वो खिलखिलाने का सदा जोखिम उठाती है।
रुलाती है ,हंसाती है, बाताती है कई किस्से
किताबों की अलग दुनिया सखी सबको लुभाती है।
कभी जोङे ,कभी तोङे,कभी फैके खिलौनों को
उठा लेती है इक लङकी हां. अपना घर बनाती है।
छलक पाते नहीं अम्मा की आंखों से कभी आंसू
सदा अरमान की खूंटी पे अपने गम सुखाती है।
मुहाने काल बैठा है मगर अहसास है किसको
जुगत रोटी की करने जिन्दगी ऐसा भगाती है।
कपट ,छल ,मोह ,मायासे विलग बच्चों की दुनिया है
तभी तो देख ले ‘पूनम’ खुदी भी सर झुकाती है।
डॉ पूनम गुजरानी
सूरत(गुजरात)
पीएचडी एम ए
काव्य संग्रह प्रकाशित
मझधार
समय क्षण भर रूक गया 
कई सम्मान. पुरस्कार प्राप्त
मोटीवेशन कार्यक्रम
कवि सम्मेलनो में सहभागिता
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।