मोहल्ले के कोने में,
रहती थी एक `ख़्वाहिश`
हर शाम पुकारती
खिड़की पर होकर खड़ी,
सपने ले लो,
हसीन तड़कते-भड़कते
जादुई सपने,
इतनी भीड़ में
कौन सुने उसकी पुकार,
गलियों की हलचल
में अक्सर दब जाती
उसकी आवाज़,
सजने से पहले ही
बिखर जाता
मानों सपनों का संसार,
घर की चारदीवारी में ही
दब जाते सारे
सतरंगी अरमान…
घुटने लगता था दम
रीति-रिवाजों के फेर से,
हर रात अंधेरे में दुबककर
देखा करती वो सपने,
बुनने लगती थी ख्वाहिशें…
रात के साथ ही गुम हो
जाते सारे सपने और अरमान,
अगली सुबह फिर
खिड़की पर खड़ी
करने लगती वो इंतज़ार,
रात का।
#कृनाल प्रियंकर
परिचय : कृनाल प्रियंकर गुजरात राज्य के अहमदाबाद से हैं और स्नातक(बीकॉम)की पढ़ाई पूरी कर ली हैl आप वर्तमान में ग्रामीण विकास विभाग(गुजरात) में कार्यरत हैंl इन्हें शुरु से ही कविताओं से विशेष लगाव रहा है,तथा कविताएं पढ़ना-लिखना बेहद पसंद हैl
Mon Feb 19 , 2018
बार-बार इनकार करने पर भी पीछा नहीं छोड़ती,तुम समय व स्थान का भी अनुमान नहीं लगाती,कब कौन-कहाँ-कैसी भी अवस्था में हो,तुम तपाक से आ जाती हो। लाख मना करने पर भी तुम्हारे कानों पर जूं नहीं रेंगती। उस दिन स्टेशन की सूनी बेंच पर तुम आकर बैठ गई। और तो […]