एक पक्षी होता है जिसे बुंदेलखंड में ‘किलकिला’ कहा जाता है। किलकिला सदैव नदी की धार के ऊपर बीच में उड़ता है। वो उड़ते हुए ही नदी में रहने वाली मछलियों को देख लेता है, ये मछलियाँ उसका भोजन होती हैं। उसे जब भी भूख लगती है, वह तीर के जैसा छूटता है और पानी के अंदर बहने वाली मछली को कुशल धनुर्धर की भाँति भेद के अपनी चोंच में पकड़ कर वापस हवा में उड़ते हुए ही उसे खाता रहता है।
किलकिला का यह करतब नदी के किनारे रहने वाला एक ‘बगुला’ देख रहा था। उसका भोजन भी मछलियाँ ही थीं, किंतु मछलियाँ किनारे पर कम ही मिलती थी,इसलिए उसे अपनी उदरपूर्ति के लिए बहुत मशक़्क़त करनी पड़ती थी।
बगुला, किलकिला की कला देख चकित हो गया और बुंदेलखंडी में बोल उठा.. वाह ..
‘भईँ तुक्क, भईँ तान।
भईँ भोजन, भईँ स्नान॥’
अर्थात वहीं उसके जीवन की कला है,वहीं सैर-सपाटा है, वहीं उसकी राग रागनी है, वहीं भोजन भी मिल जाते हैं, और वहीं स्नान भी हो जाता है। यही जीवन की सम्पूर्णता है जिसमें किलकिला को कुछ पाने के लिए कुछ भी खोने की ज़रूरत नहीं। तो क्यों न मैं भी वही करुं जो किलकिला करता है, क्योंकि हम दोनों का भोजन भी एक ही है तो क्षमता भी एक ही होगी।
यह सोच के बगुला फुर्र से उड़ के नदी की धार के बीच में पहुँच गया, धार की गहराई देख थोड़ा डरा। उसने सोचा कि पहली बार है,कहीं आनंद के चक्कर में डूब न जाऊँ, तो क्यों न पहले किनारे पर ही हवा में उड़ते हुए छलांग मार के मछली पकड़ने का अभ्यास कर लिया जाए ?
विचार नीतिपूर्ण था,सो बगुला किनारे पर पहुँच कर उड़ने लगा क्योंकि उसके गुरु ने सिखाया था कि, किसी भी कार्य की सफलता के लिए अभ्यास आवश्यक होता है। मन में अभ्यास की अनिवार्यता के प्रति आस्था को धारण करते हुए उड़ ही रहा था कि, उसे अचानक किनारे के उथले जल में कुछ मछलियाँ तैरती हुई दिखाई दीं, जिनमें से एक को उसने अपना लक्ष्य बना लिया और ध्यानपूर्वक किलकिला का किया गया अवलोकन स्मरण किया। किलकिला के जैसा ही उसने अपने शरीर को साधा और बिलकुल उसी के अन्दाज़ में मछली पर टूट पड़ा, उसका निशाना अचूक लगा था। मछली उसके मुँह में थी वह सफल हो गया था..किंतु यह क्या ?? उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, उसे साँस लेने में दिक़्क़त हो रही थी, अचानक उसे महसूस हुआ कि, उसका सिर नदी के किनारे के कीचड़ में धँस चुका है। बगुला घबरा गया,उसके प्राणों पर संकट था।अपनी जान बचाने के लिए उसने कीचड़ से सिर को निकालने के लिए झटका दिया,जिससे उसका सिर बाहर निकलने की जगह और भीतर धँसने लगा,उसका धड़ फड़फड़ाने लगा,वह इधर उधर कुलांटें मारने लगा।
बगुले का पूरा खेल नदी के किनारे बैठे एक संत जी देख रहे थे। वे बगुले के मन की बात समझ रहे थे बगुला-,किलकिला होना चाहता था, इस चक्कर में बेचारा किलक़िला तो बन नहीं पाया और अपने प्राण भी गवाँ दिए।
संत जी ने मरणासन्न बगुले को बाहर निकाला और उसे अंतिम उपदेश बुंदेलखंडी भाषा में दिए(चूँकि बगुला बुंदेलखंडी था)। बोले-‘हे बगुला..
ते जामे जाने नहीं,
(जो जिस विषय में जानता न हो)
और ते तामे जाए।
(और यदि उस विषय में-क्षेत्र में जाता है)
मुंड कपे में घुस गई,
(तो उसका सिर,बुद्धि,विवेक कीचड़ में फँस जाएगा)
तो रूंड कुलांटे खाए॥’
(परिणामस्वरूप उसका धड़ धरती पर फड़फड़ाता रहेगा।)
इसलिए, हे मित्र किसी और के जैसा नहीं, स्वयं के जैसा बनना ही कल्याणकारी होता है। अपने हिस्से के दुःख किसी दूसरे के दूर से दिखाई देने वाले सुखों से कहीं बहुत अधिक आनंददायक होते हैं।
#आशुतोष राणा
परिचय: भारतीय फिल्म अभिनेता के रूप में आशुतोष राणा आज लोकप्रिय चेहरा हैं।आप हिन्दी फिल्मों के अलावा तमिल,तेलुगु,मराठी,दक्षिण भारतऔर कन्नड़ की फिल्मों में भीसक्रिय हैं। आशुतोष राणा का जन्म १० नवम्बर १९६७ को नरसिंहपुर के गाडरवारा यानी मध्यप्रदेश में हुआ था। अपनी शुरुआती पढ़ाई यहीं से की है,तत्पश्चात डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय से भी शिक्षा ली हैl वह अपनेमहाविद्यालय के दिनों में हीरामलीला में रावण का किरदार निभाया करते थे। प्रसिद्धअभिनेत्री रेणुका शाहने से विवाह करने वाले श्री राणा ने अपनेफ़िल्मी सफ़र की शुरुआत छोटे पर्दे से की थी। आपने प्रस्तोता के रूप में छोटे पर्दे पर काफीप्रसिद्धी वाला काम किया। हिन्दीसिनेमा में आपने साल १९९५ मेंप्रवेश किया था। इन्हें सिनेमा में पहचान काजोल अभिनीत फिल्म`दुश्मन` से मिली। इस फिल्म में राणा ने मानसिक रूप से पागल हत्यारे की भूमिका अदा की थी।आध्यात्मिक भावना के प्रबल पक्षधर श्री राणा की ख़ास बात यह है कि,दक्षिण की फिल्मों में भी अभिनय करने के कारण यहदक्षिण में `जीवा` नाम से विख्यात हैं। `संघर्ष` फिल्म में भी आपके अभिनय को काफी लोकप्रियता मिली थीl लेखन आपका एक अलग ही शौक है,और कई विषयों पर कलम चलाते रहते हैंl