हे ! ईश मुझको तू बुला ले।
अंक में अपने सुला ले॥
क्यों तमस का नित गर्त देखा।
सच हुई कब हस्त – रेखा?
झूठ कब तक है मुस्कराना?
क्यों भ्रमित जीवन बिताना?
तोड़कर भव – सम्बन्ध सारे,
चाह तेरे पास आना।
ओ ! परमात्मा अब आत्मा ये,
चाहती खुद में मिला ले॥
हे ! ईश मुझको तू बुला ले।
अंक में अपने••••••••।
क्या यहाँ कुछ बाकी रहा है?
कौन क्या बाकी रहेगा?
स्वप्न मृदु-मधु मन देखता जो,
वेदना ही वह सहेगा।
ध्वंस में निर्माण कैसा?
प्राप्त कर लूँ निर्वाण ऐसा।
राह देखे अब प्रेय की क्यों?
मीत धोखा है भुला दे।
हे ! ईश मुझको तू बुला ले॥
अंक में••••••••••।
क्यों राम – सीता कृष्ण-राधा।
चिर वियोगी साथ आधा।
शशि-रश्मि-प्रेमी चिर प्रतीक्षित।
मन चकोरा क्यों अशीक्षित ?
दुर्दिन यही क्यों याद रखना?
स्वाद दुख का मात्र चखना।
आह ! लीला कैसी अनोखी?
तू मुझे जी भर रुला ले।
हे ! ईश मुझको तू बुला ले।
अंक में •••••••।
प्रश्न हो हल यह चाहता मन,
क्यों दिया अभिशप्त जीवन?
शुष्क प्यासा है गात- सावन,
चाहता मन – मेघ पावन।
क्यों छू न पाया प्रणय-वीथी?
मधुमास ऋतु अति निकट थी।
फिर भी झुलसता ही गया क्यों,
पतझड़ी झोंके झुला के।
हे ! ईश मुझको तू बुला ले॥
अंक में अपने••••••••••••।
अब थक गया मन गीत गाते,
नित आस के विश्वास के।
पर निराशा ही आ रही है,
चहुँओर मेरे पास में।
है अब न जीवन-गीत गाना,
उर भँवर में क्यों फँसाना?
हों दुख हवन यह व्यर्थ कहना।
डूबने दे या जला दे।
हे ! ईश मुझको तू बुला ले॥
अंक में अपने••••••••।
इन पत्थरों ने पूज्य बनकर,
उर ‘अधर ‘ पर आज तनकर।
घात आशाओं पर किया है,
घाव सर्जक को दिया है।
हा! मिथ हुआ सुंदर सृजन ये,
शून्य में सब स्वप्न मन के।
अब क्षमा भी मैं दे न पाऊँ,
नेह आमंत्रण भला दे ।
हे ! ईश मुझको तू बुला ले॥
अंक में••••••••।
#शुभा शुक्ला मिश्रा ‘अधर’