कैसे कहूँ………

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pratibha
किशोरवय के पड़ाव पर पाँव रखती मासूम रजस्वला बेटियाँ मासिक धर्म के जैविक परिवर्तन से यकायक अकस्मात् सयानी हो जाती है,और शारीरिक बदलाव को सहज स्वीकार नहीं कर पाती हैं। मानसिक व शारीरिक संघर्ष की इन चुनौतियों में हर मां का ये दायित्व बनता है कि,बच्चियों से दोस्ताना व्यवहार कर उनका परामर्श कर इस दौर को सहज करें,मगर इक्कीसवीं शती के इस प्रगतिशील समाज की माँ बच्चियों के साथ सौंदर्य पार्लर में जाना तो प्रगतिशीलता का पैमाना मानती है,मगर अफ़सोस वय परिवर्तन के इस गंभीर पहलू की चर्चा पर पर्दा डालतीं है।
तेरह-चौदह वर्ष की बच्चियाँ छुपने लगती हैं अपनों से। शारीरिक बदलाव को स्वीकार करने में उन्हें  वक्त लगता है,इस समय बच्चियों की शारीरिक व मानसिक तकलीफों में माँ की जिम्मेवारी बढ़ जाती है,हर माँ का ऐसे में बच्चियों के साथ दोस्ताना व्यवहार अपेक्षित होता है,लेकिन आज भी मासिक धर्म पर खुलकर बातें नहीं होतीl ऐसा लगता है मानों ये कोई छूत की बीमारी हो ? इस विषय पर आज भी हमारी सोच नहीं बदली है।

‘मेंसुरेशन’,‘पीरियड्स’ या ‘मासिक धर्म’, अगर आप इन शब्दों को दुनिया के सामने कहेंगी,तो लोग आपको ऐसे देखेंगे जैसे आपने कोई अपराध कर दिया हो। स्त्री के शरीर में हर महीने होने वाले इस चक्र को खुद स्त्री ही छूत मानती है। वो आत्मग्लानि से भर ऐसे महसूस करती है,मानो कोई पाप हो गया हो और इसको उसे दुनिया से हर वक़्त इसे छिपाना पड़ता है। बेशक पीरियड्स या मासिक धर्म को एक अतरंगी क्रिया हो सकती है,पर इस को निकृष्ट प्रक्रिया समझना हमारी संकुचित सोच ही है।
हमारे समाज में ‘मेंसुरेशन वुमन’ को ‘अपवित्र’ माना जाता है,लेकिन ये अपवित्रता मासिक धर्म ख़त्म होने के साथ ही समाप्त हो जाती है,यह बड़ी विडम्बना है! इसके अनुसार,वो रसोईघर से निष्कासित कर दी जाती है।
इसे दुर्भाग्यपूर्ण संयोग ही कहा जाएगा कि,जहां एक तरफ़ आसाम के मान्यता प्राप्त ‘कामाख्या मंदिर’ में कामाख्या देवी ‘ब्लीडिंग गॉडस’ की योनि की पूजा होती है,वहीं इसके विपरीत हिन्दू धर्म महिलाओं को धर्मस्थलों से दूर रखने की हिदायत देते हैं,आखिर क्यों?
अधुनातन संदर्भ में देखा जाए तो,इस तरह के नियम-कानून महिलाओं के लिए कारगर नहीं हैं,ख़ासकर तब,जब सुबह उठकर उसे अपने बच्चों का टिफिन और सम्पूर्ण परिवार के भोजन की व्यवस्था करनी है। पुराने जमाने में संयुक्त परिवारों में दादी-नानी इस परिस्थिति में घर की ज़िम्मेदारी वहन कर लिया करती थीं,लेकिन अब एकाकी परिवार व्यवस्था में ऐसा मुश्क़िल है।इसलिए बेहतर यही होगा कि,हम इन पुरानी मान्यताओं को पीछे छोड़ समय के साथ चलें,जैसे अन्य समाजों की महिलाएं घरों का प्रबन्धन रही हैं।
एक ताजा समाचार के अनुसार-मुंबई की डिजिटल मीडिया कंपनी ने घोषणा की है कि,वह महिलाओं को पीरियड के पहले दिन छुट्टी देगी। कंपनी की इस पहल की सराहना करते हुए महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले एनजीओ ‘सखी’ की कार्यकर्ता सविता कहती हैं, `मुझे समझ नहीं आता कि,इसका विरोध क्यों हो रहा है? माहवारी के दिनों में महिलाओं को दर्द होना स्वाभाविक है और यदि किसी कंपनी ने महिलाओं को इन मुश्किल दिनों में अवकाश की सुविधा दी है तो,इसमें गलत क्या है?`
भारत में माहवारी के दिनों में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर आंकड़े चौंकाने वाले हैं। ये बताते हैं कि,दस में से तीन लड़कियों को अपनी पहली माहवारी के बारे में कोई जानकारी नहीं होती! दूसरी तरफ इन मुश्किल दिनों में उच्च शिक्षित महिलाओं की भागीदारी कार्यस्थलों पर घटती पाई गई!
माहवारी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है,महीने के ये मुश्किल भरे चार से पांच दिन महिलाओं के लिए शारीरिक एवं मानसिक रूप से थका देने वाले होते हैं,लेकिन थकावट और दर्द के लिए बाकायदा छुट्टी का बंदोबस्त किया जाए ?,ये बहस का एक अलग विषय हो सकता है।
कुल मिलाकर इस निष्कर्ष पर पहुंच गए हैं कि,चाहे छुट्टी मिले या न मिले पर सबसे पहले कम-से-कम हमें अपनी सोच बदलनी चाहिए और छूत-अछूत जैसी विकृत मानसिकता से बाहर निकलना होगा।
कभी-कभी उज्ज्वल भविष्य के लिए पुरानी परम्पराओं को तोड़ना भी पड़ता है। आज समय आ गया है जब आप अपनी सयानी होती बेटी को इस प्रक्रिया से रूबरू करवाएं,ताकि आने वाली परेशानी को वो सहजता से स्वीकार करे और शायद इस तरह कुछ हद तक,उन तकलीफ के दिनों को सूझ-बूझ से कम किया जा सके।

                                                            #प्रतिभा श्रीवास्तव ‘अंश
परिचय : प्रतिभा श्रीवास्तव `अंश` मध्यप्रदेश के भोपाल में रहती हैंl लेखन आपकी पसंद का कार्य हैl जन्म तारीख १ मार्च १९८० और जन्म स्थान-छपरा (बिहार) हैl शिक्षा-एम.ए.(हिन्दी) तथा पीजीडीसीए हैl आप मध्यप्रदेश लेखिका संघ की सदस्या हैंl विभिन पत्र-पत्रिकाओं में कविता व लेख का नियमित प्रकाशन जारी हैl उपलब्धि यही है कि,शब्द शक्ति सम्मान और हिन्दीसेवी सम्मान २०१६ से सम्मानित हैंl आपकी लेखन सक्रियता में आत्मकथ्य,आकाशवाणी पर बाल कविता का प्रसारण और विभिन्य जगहों पर काव्य पाठ करना शामिल हैl

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।