मैं मेरी माँ का अनमोल गहना,
फौजी का अरमान तिरंगा हूँ।
मैं तीन रंगों में विभाजित,लेकिन
एकता का रंग तिरंगा हूँ …….॥
मैं वीरांगना का उजड़ा सुहाग,
सोलह श्रृंगार तिरंगा हूँ।
मैं देश का गौरव माँ का आँचल,
वीरों का लिबास तिरंगा हूँ …..॥
धर्म-जाति से मेरा नहीं कोई वास्ता,
मैं भारत की पहचान तिरंगा हूँ।
मैं जवानों का मखमली ख्वाब,
कफ़न रुपी अंतिम वस्त्र तिरंगा हूँ…..॥
मैं पथराई आँखों की चमक,
माँ भारती का लाल तिरंगा हूँ।
मैं मातृभूमि के सिर का ताज,
अटूट विश्वास तिरंगा हूँ ……॥
मैं मेरी माँ का अनमोल गहना,
सोलह श्रृंगार तिरंगा हूँ ……॥
#प्रणिता सेठिया ‘परी’
परिचय : प्रणिता राकेश सेठिया का लेखन में उपनाम ‘परी’ है। आप
रायपुर(छत्तीसगढ़)में रहती हैं। लेख,कविता,गीत,नाटिका,लघुकथा,
कहानी,हाइकु,तुकांत-अतुकांत आदि रचती हैं। आपकी साहित्यिक उपलब्धि यही है कि,कई सामाजिक पत्रिकाओं तथा समाचार पत्रों में रचनाएं प्रकाशित होती हैं। शतकवीर सम्मान,महफ़िल-ए-ग़ज़ल और काव्य भूषण सम्मान से अलंकृत हो चुकी हैं। हाइकु रचनाकारों की किताब में आपकी रचना भी जल्दी ही प्रकाशित होगी। अन्य उपलब्धि में उच्च १० उद्यमी महिलाओं में आप चौथे क्रम पर रहीं हैं। प्रणिता राकेश सेठिया ‘परी’ ने उत्कृष्ट समाजसेवा के लिए कई बार सम्मान पाया है।