आज अपना वतन ही बेगाना हुआ,
हक़ की खातिर लड़े तो हर्जाना हुआ।
नाक नीचे से मुजरिम गुज़र चल गया,
घर निरपराध का ही निशाना हुआ।
पाक सदियों से जो था सदन अब तलक,
आज पाखंडियों का ठिकाना हुआ।
मेरे व्रण पर लवण नित छिड़कते रहे,
उफ़ ज़रा कर दिया तो बहाना हुआ।
न्याय पाने की उम्मीद में था चला,
भर उमर के लिए कैदखाना हुआ।
घोल ‘गुंजन’ गज़ल में शहद प्यार का,
कि चमन मुल्क़ का कातिलाना हुआ।
#विजय गुंजन
परिचय : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा साहित्यिक अवदान के लिए विजय गुंजन को पुरस्कृत किया जा चुका है। शंकरदयाल शर्मा स्मृति संस्थान द्वारा भी नवगीत रत्न सम्मान दिया गया था। आप बिहार राज्य के निवासी हैं। साथ ही बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में २०१४ में गीतकार के रूप में आरसी प्रसाद सिंह सम्मान पत्र भी प्राप्त किया है।