
ठण्ड के मौसम में
मैं अक्सर सोचा करती हूँ
उस बर्फ की नदी को लेकर
जिसकी सतह
संगमरमरी पत्थर का अहसास
दे जाती है
कितना दुखदायी होता होगा
बहती नदी का
पत्थर हो जाना
ठण्डा पड़ना याकि
संवेदन शून्य हो जाना
परंतु फिर
याद आती है
उसके भीतर की जीवंत दुनिया
जहाँ अब भी
तैर रही हैं जिंदगी
गाती गुनगुनाती
आनंद का उत्सव मनाती
तो लगता है कि
हर सतह का कुरेदा जाना
जरूरी नहीं
बस नाउम्मीदी
अच्छी नहीं होती
तब मैं फिर से
लौट आती हूँ
उम्मीदों की दुनिया में…
#डॉ. आरती दुबे,
इन्दौर, मध्यप्रदेश

