
वो पीपल बहुत ही छाँव देता है
सुकून मुझको मेरा गाँव देता है
चला आया आज शहर से दूर
बच्चा हो या बूढ़ा लगाव देता है
लगा लेते गले से किस्से सुनाते है
नहीं कोई भी यहां घाव देता है
नदी का किनारा वो खूबसूरत पल
कोई नहीं यहां टकराव देता है
सुकून है मेरे इस गाँव की माटी में
अनमोल है रिश्ते सदभाव देता है
बनी रहती त्योहारों की गरिमा भी
मूछों को कोई अपनी ताव देता है
किशोर छिपेश्वर”सागर”
भटेरा चौकी बालाघाट

