पिता का चिंतन

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  1. मैं जनमानस में पुत्रजन्म की ही क्यों लगन देखता रहा |
    उनके जन्मोत्सव पर मनाते जश्न में क्यों मग्न देखता रहा|
  2. अब जाकर मै विचारों से अधिक यथार्थ में उतर पाया हूँ,
    कामपिपासु नजरों का होते कृत्य जघन देखता रहा |

3.हाँ हर रोज रंगे रहते है अखबार जिन रक्तिम खबरों से,
पढकर उन्हे मन में उठी दहशतभरी सिहरन देखता रहा |

  1. जाने कब जाग उठे किसी दिल में वहसी हैवानियत,
    मतलब के बनते रिश्तों से विश्वास की कतरन देखता रहा |
  2. क्रमश: निर्भयाओं का होता रहा ऐसा बेख़ौफ अंजाम ,
    दहश्तगर्दी में पिता की अनवरत बढती धड़कन देखता रहा|
  3. पुत्री को जब लिंगभेदी वर्जनाए समझाने में लाचार हुआ,
    नादान बालमन का आक्षेपक सुन तड़पन देखता रहा |

7.”सीमा”पतन तो हो रहा है संस्कृति और संस्कारों का,
तभी तो आज जिंदा कन्या भ्रूण का दफन देखता रहा |

परिचय
सीमा लोहिया
न्यू हाऊंसिंग बोर्ड कॉलोनी
झुंझूनू, (राजस्थान)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।