रेल यात्रा या जेल यात्रा …!!

tarkesh ojha
tarkesh ojha

ट्वीटर से समस्या समाधान के शुरूआती दौर में मुझे यह जानकार अचंभा होता
था कि महज किसी यात्री के ट्वीट कर देने भर से रेल मंत्री ने किसी के लिए
दवा तो किसी के लिए दूध का प्रबंध कर दिया। किसी दुल्हे के लिए ट्रेन की
गति बढ़ा दी ताकि बारात समय से कन्यापक्ष के दरवाजे पहुंच सके। क्योंकि
रेलवे से जुड़ी शिकायतों के मामले में मेरा अनुभव कुछ अलग ही रहा। छात्र
जीवन में रेल यात्रा से जुड़ी कई लिखित शिकायत मैने केंद्रीय रेल मंत्री
समेत विभिन्न अधिकारियों से की। लेकिन महीनों बाद जब जवाब आया तब तक मैं
घटना को लगभग भूल ही चुका था। कई बार तो मुझे दिमाग पर जोर देकर याद
करना पड़ा कि मैने क्या शिकायत की थी। जवाबी पत्र में लिखा होता था कि
आपकी शिकायत मिली…. कृपया पूरा विवरण बताएं जिससे कार्रवाई की जा सके।
जाहिर है किसी आम इंसान के लिए इतना कुछ याद रखना संभव नहीं हो सकता था।
रोज तरह – तरह की हैरतअंगेज सूचनाओं से मुझे लगा कि शायद प्रौद्योगिकी के
करिश्मे से यह संभव हो पाया हो। बहरहाल हाल में नवरात्र के दौरान की गई
रेल यात्रा ने मेरी सारी धारणाओं को धूल में मिला दिया। सहसा उत्तर
प्रदेश स्थित अपने गृह जनपद प्रतापगढ़ यात्रा का कार्यक्रम बना। 12815
पुरी – आनंदविहार नंदन कानन एक्सप्रेस के स्लीपर कोच में बड़ी मुश्किल से
हमारा बर्थ कन्फर्म हो पाया। खड़गपुर के हिजली से ट्रेन के आगे बढ़ने के
कुछ देर बाद मुझे टॉयलट जाने की जरूरत महसूस हुई। भीतर जाने पर मैं हैरान
था , क्योंकि ज्यादातर टॉयलट में पानी नहीं था। मैने तत्काल ट्वीटर से
रेलवे के विभिन्न विभागों में शिकायत की। मुझे उम्मीद थी कि ट्रेन के
किसी बड़े स्टेशन पहुंचते ही डिब्बों में पानी भर दिया जाएगा। शिकायत पर
कार्रवाई की उम्मीद भी थी। लेकिन आद्रा, गया, गोमो और मुगलसराय जैसे बड़े
जंक्शनों से ट्रेन के गुजरने के बावजूद हालत सुधरने के बजाय बद से बदतर
होती गई। पानी न होने से तमाम यात्री एक के बाद एक टॉयलटों के दरवाजे खोल
रहे थे। लेकिन तुरंत मुंह बिचकाते हुए नाक बंद कर फौरन बाहर निकल रहे
थे। क्योंकि सारे बॉयो टॉयलट गंदगी से बजबजा रहे थे। वॉश बेसिनों में भी
पानी नहीं था। इस हालत में मैं इलाहाबाद में ट्रेन से उतर गया। हमारी
वापसी यात्रा आनंद विहार – पुरी नीलांचल एक्सप्रेस में थी। भारी भीड़ के
बावजूद सीट कंफर्म होने से हम राहत महसूस कर रहे थे। लेकिन पहली यात्रा
के बुरे अनुभव मन में खौफ पैदा कर रहे थे। सफर वाले दिन करीब तीन घंटे तक
पहेली बुझाने के बाद ट्रेन आई। हम निर्धारित डिब्बे में सवार हुए। लेकिन
फिर वही हाल। इधर – उधर भटकते वेटिंग लिस्ट और आरएसी वाले यात्रियों की
भीड़ के बीच टॉयलट की फिर वही हालत नजर आई। किसी में पानी रिसता नजर आया
तो किसी में बिल्कुल नहीं। कई वॉश बेसिन में प्लास्टिक की बोतलें और
कनस्तर भरे पड़े थे। प्रतापगढ़ से ट्रेन के रवाना होने पर मुझे लगा कि
वाराणसी या मुगलसराय में जरूर पानी भरा जाएगा। लेकिन जितनी बार टॉयलट गया
हालत बद से बदतर होती गई। सुबह होते – होते शौचालयों में गंदगी इस कदर
बजबजा रही थी कि सिर चकरा जाए। ऐसा मैने कुछ फिल्मों में जेल के दृश्य
में देखा था। लोग मुंह में ब्रश दबाए इस डिब्बे से उस डिब्बे भटक रहे थे
ताकि किसी तरह मुंह धोया जा सके। बुजुर्ग, महिलाओं और बच्चों की हालत
खराब थी। फिर शिकायत का ख्याल आया… लेकिन पुराने अनुभव के मद्देनजर ऐसा
करना मुझे बेकार की कवायद लगा। इसी हालत में ट्रेन हिजली पहुंच गई। हिजली
के प्लेटफार्म पर भारी मात्रा में पानी बहता देख मैं समझ गया कि अब साफ –
सफाई हो रही है… लेकिन क्या फायदा … का बरसा जब कृषि सुखानी…।
ट्रेन से उतरे तमाम यात्री अपना बुरा अनुभव सुनाते महकमे कोस रहे थे। मैं
ट्वीटर से समस्या समाधान को याद करते हुए घर की ओर चल पड़ा।

#तारकेश कुमार ओझा

लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं | तारकेश कुमार ओझा का निवास  भगवानपुर(खड़गपुर,जिला पश्चिम मेदिनीपुर) में है |

matruadmin

Next Post

इश्क़ का रंग

Mon Oct 14 , 2019
नहीं मिलती कहीं से अब तो ख़बर तेरी । तेरी मोहब्बत के सफ़र में है ज़िन्दगी मेरी ।। चाहतें दिल की ये अरमान तेरे लिए हैं ।।। ख़ुद में खुद को ढूंढ रही ज़िन्दगी मेरी ।।।। अहसास बेज़ुबान होते हैं दिल के यारा । उसकी नज़रों में जगह ढूंढ रही […]

पसंदीदा साहित्य

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।