कागज के नाव और बचपन

aashutosh kumar
आज दफ्तर से निकलने में देर हो गई बरसात का मौसम था। हल्की बूँदा-बांदी हो रही थी। आकाश में बादल उमड़ रहे थे, मानो जोड़ की बारिस आने वाली हो।हल्की हल्की हवा और सून-सान पगडंडियों से चलता हुआ मैं घर की तरफ बढ़ रहा था कि अचानक मेरी नजर खेल रहे कुछ बच्चों पड़ पड़ी जो कागज की नाव बनाकर पानी में बहा रहे थे।मै सोचने लगा और पुरानी यादों में ऐसा खोया कि सब कुछ जैसे आज ही घटित हुआ हो।
क्या वो दिन थे?
मै और मेरे साथी हमेशा बारिस के दिनों में ऐसे ही खेला करते थे । हरगम से दूर यही तो उम्र होती है जिसे हर कोई खुल के जीता है। न जात न मजहब न भूख न प्यास केवल अपनापन का एहसास।पर जैसे ही बुद्धि और मानसिक विकास मनुष्य में आता है सारी चीजे बदल जाती हैं देखने का नजरिया और वो अपनापन समाप्त हो जाती है और लोग दिनचर्या में इस कदर खो जाते हैं कि सबकुछ भूला देते हैं।
क्या इसे ही मानसिक विकास कहा जाता है ?
अगर यह बुद्धि का विकास है तो कैसे ? क्या बुद्धि विकास जात-पात और मजहब समुदाय के दायरे में सिमट गया है?ऐसे न जाने खितने सवाल मेरे जेहन में मुझसे पूछने लगे और में गहरी सोच मे डूबा हुआ उन बच्चों को खेलता देखता रहा।
जब मैं आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुए घर पहुँचा तो शाम की दिया बाती का समय हो रहा था मैं अपनी बचपन की ख्यालों में खोया हुआ बचपन के बारे में ही सोचने लगा कैसे हमलोग गिल्ली डंडा,कदमताल गोईलचिका और क्रिकेट खेला करते थे और मामा को परेशान किया करते थे।दरअसल जब भी हमलोगों की बैट या विकेट टूट जाती थी, तो मामा काम आते थे।जब मामा सो जाते दोपहर को तो उनके तख्ते की बैट बनाता और उनके बाँस की विकेट मामा बडे ही झक्की मियाज थे जगे हुए में या माँगने से देते नहीं और जब हमलोग ले लेते थे तो कुछ कहते भी नहीं मन ही मन वो हमलोगो से प्यार भी बहुत करते थे।गर्मी के दिनों में तो उनको दोपहर में उतने ही देर सोने देते थे जितने की हमलोगों की जरूरत होती थी वो भी इस बात को समझते थे । ओह कितना हल्ला होता था कितना मजा आता था।
तकरीब 20 वर्षों के बाद मैं वहां अचानक गया था घरती वही है पेड़ पौधे वही हैं पहले से बडे और विशाल मामा भी है उनके तख्ते भी है पर खेलने वाला वो बचपन नहीं है न लडको की वो झुण्ड है मामा देखकर रोने लगे उनका बुढापा आ गया है वो भी उन दिनों के बारे में बात करने लगे और मन रोने जैसा हो गया।
यही सब सोच रहा था कि आवाज आई!
देखो दस बज गये है खाना खालो? श्रीमति की आवाज जो बाते कम सबाल ज्यादा थी,सवालो की बरसात तो रोजाना रोजमर्रा की आदत हो चली है करीब करीब यह तो मुख्य आहार हो चला है।

बचपन
———
काले-काले बादल
झूमती घटा
पूरवईया हवा और
सावन की रिमझिम वारिश
में भींगना याद दिलाती है
बचपन के वो कागज के नाव।

हवा का झोंका और तेरा चहकना
जैसे कोयल की कूक ।
अबके सावन खोज रही
तूझे प्रिय
वो बचपन की मिठास
कितने बरस बीते
पर नही वो सूध ।

अब तो हवाओं में भी
कडवाहट है
बूंदो में वो मिठास नहीं
कागज के नाव भूल गए अब तो
मिट्टी से शायद प्यार नही
चली आओ एक बार
अबके सावन में
फिर बचपन की तरह
मै भी बच्चा बन जाऊँगा
बचपन को बुलाऊँगा ।।
       “आशुतोष”
                                 पटना बिहार

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